पति बाहर, भाभी अकेली और गली का कबाड़ी वाला – Akeli Bhabhi Hindi Sex Story

सुबह के सात बज रहे थे। राजू ने अपनी साइकिल ठेले पर अखबारों का गट्ठर और खाली बोतलें सँभाले। गली के मोड़ से आवाज लगाई, “कबाड़ी… अखबार बोतल… कबाड़ी…” आवाज गली में गूंजती।

छोटे शहर की संकरी गलियाँ अभी जाग ही रही थीं। दूध वाला निकला, सब्जी वाला साइकिल लेकर गुजरा। राजू रोज की तरह आगे बढ़ा।

निशा का घर तीसरी गली में था। पीले रंग का छोटा सा मकान। पति रमेश ज्यादातर बाहर रहता।

महीने में दस-बारह दिन ही घर आता। निशा अकेली रहती। बेटा स्कूल जाता।

राजू जब पहली बार उस घर के सामने रुका तो निशा ने दरवाजा खोला। हाथ में पुराने अखबार थे। “कितने के हैं?

” राजू ने पूछा। “लो, गिन लो,” निशा ने कहा। आवाज साफ थी।

राजू ने तौल लिया। पैसे दिए। निशा ने लिया और दरवाजा बंद कर दिया।

बात यहीं खत्म हो गई। लेकिन अगले हफ्ते फिर वही घर। फिर तीसरे हफ्ते।

राजू अब परिचित चेहरा बन गया था। निशा कभी-कभी मुस्कुरा देती। “आज तो बोतलें भी हैं।

” राजू जवाब देता, “हाँ भाभी, रख लूँ? ”धीरे-धीरे बातें बढ़ने लगीं। राजू पूछता, “भाई साहब कब आते हैं?

” निशा कहती, “पता नहीं। काम में उलझे रहते हैं। ” राजू बताता अपने घर की।

पत्नी गाँव में रहती। बच्चे छोटे। शहर में अकेला कमरा किराए पर।

दोनों के अकेलेपन की बातें छुप-छुप कर निकलने लगीं। एक सुबह निशा ने कहा, “अंदर आ जाओ। पानी पी लो।

धूप तेज है। ” राजू हिचकिचाया लेकिन चला गया। बैठक में बैठकर पानी पिया।

निशा पास खड़ी रही। साड़ी सादी थी लेकिन शरीर का उभार साफ दिख रहा था। राजू की नजर चली गई।

उसने जल्दी से नजर हटा ली। अगली मुलाकात में निशा ने चाय बनाई। दोनों बैठकर पीने लगे।

बातें लंबी चलीं। निशा बताने लगी कैसे पति घर आकर भी थका रहता है, बात नहीं करता। राजू बताने लगा कैसे पत्नी दूर है, रात को नींद नहीं आती।

गली में शोर था। पड़ोसी निकल रहे थे। निशा ने आवाज धीमी कर ली।

“यहाँ सब सुन लेते हैं। ”राजू हँस दिया। “इसलिए तो मैं सुबह ही आता हूँ भाभी।

”हफ्तों बीत गए। राजू अब सिर्फ कबाड़ लेने नहीं आता था। कभी दस मिनट, कभी बीस मिनट रुक जाता।

निशा भी इंतजार करने लगी। एक दिन राजू ने कहा, “आप अकेली कैसे रह लेती हैं इतने दिन? ”निशा ने सिर झुकाया।

“आदत पड़ गई। लेकिन कभी-कभी… बहुत अकेला लगता है। ”राजू का दिल तेज धड़कने लगा।

उसने धीरे से कहा, “मैं भी। ”उस दिन निशा ने दरवाजा बंद कर दिया। बैठक में दोनों खड़े थे।

राजू ने हिम्मत करके निशा का हाथ पकड़ लिया। निशा ने नहीं छुड़ाया। नजरें मिलीं।

राजू ने उसे अपनी तरफ खींचा। होठों पर होठ रख दिए। चुंबन पहले धीमा था, फिर गहरा होता गया।

निशा के हाथ उसके कंधों पर थे। राजू का हाथ उसकी कमर पर। फिर धीरे-धीरे ऊपर सरककर चूची पर आ गया।

साड़ी के ऊपर से दबाया। निशा की साँस तेज हो गई। “नहीं… ऐसा नहीं…” निशा ने फुसफुसाया लेकिन शरीर आगे की ओर झुक गया।

राजू के हाथ काँपते हुए ब्लाउज के छोटे-छोटे हुक खोलने लगे। कपड़ा जैसे ही ढीला हुआ, निशा की भारी और गोल स्तन बाहर छलांग लगाकर आ गए। दूधिया रंग की नरम मांस जो हथेलियों में दबते ही अपना पूरा आकार बिखेर रही थी।

राजू ने दोनों को जोर से थाम लिया। उँगलियों के बीच लंबे निप्पल को दबाकर मरोड़ा। निप्पल पहले से ही खड़े और सख्त हो चुके थे।

वह झुका और एक निप्पल को मुँह में खींच लिया। जीभ से गोल-गोल घुमाते हुए जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्का काटा तो निशा की कमर अपने आप मेहराब बन गई।

गले से दबी हुई लंबी कराह निकली—“आह… राजू…”राजू दूसरी तरफ भी वैसा ही करने लगा। दोनों स्तनों को बारी-बारी मुँह में भर-भर कर चूसता, काटता और हथेलियों से निचोड़ता रहा। निशा का शरीर काँप रहा था।

राजू ने साड़ी को कमर तक ऊपर खींच दिया। पैंटी के ऊपर से उसकी गरम और भीगी हुई दरार को सहलाने लगा। कपड़ा पहले से गीला था।

उसने पैंटी को एक झटके में जाँघों तक खींच लिया। बीच की गुलाबी दरार पूरी तरह चमक रही थी। राजू ने दो मोटी उँगलियाँ वहाँ फेर दीं।

गीलापन उँगलियों पर चिपक गया। फिर उँगलियों को अंदर तक धकेल दिया। तंग और गर्म दीवारें उँगलियों को जकड़ रही थीं।

निशा की टाँगें काँपने लगीं। जाँघें अपने आप फैल गईं। राजू ने निशा को सोफे पर धकेल दिया।

उसकी दोनों जाँघें पकड़कर और चौड़ी कर दीं। अपना धोती का नाड़ा खोला। सख्त, नसों से भरा और मोटा लंड बाहर निकला।

निशा की आँखें उस पर ठहर गईं। राजू ने मोटे सिरे को उसकी भीगी दरार पर रखा। धीरे से दबाव दिया।

सिरा अंदर घुसते ही निशा की आँखें बंद हो गईं। मुँह से दर्द और मजे की मिली-जुली आवाज निकली—“धीरे… बहुत दिन बाद… फाड़ मत देना…” राजू रुका नहीं। एक-एक इंच करके पूरा अंदर तक पहुँचा दिया।

अंडकोष उसकी जाँघों से जा टकराए। दोनों की साँसें एक पल के लिए रुक गईं। फिर राजू ने कमर हिले।

पहले लंबे और गहरे धक्के। हर बार पूरा निकालकर फिर जड़ तक धकेलता। निशा की भारी स्तन उसके हर धक्के के साथ जोर-जोर से उछल रहे थे।

राजू ने झुककर दोनों निप्पल को फिर मुँह में ले लिया। चूसते और काटते हुए गति तेज कर दी। सोफे की चरमराहट तेज हो गई।

निशा के नाखून उसकी पीठ पर गहरी लकीरें बना रहे थे। अंदर की दीवारें लंड को बार-बार जकड़ रही थीं। पानी की चप-चप आवाज साफ सुनाई दे रही थी।

राजू ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर चढ़ा दीं। और गहराई तक पहुँचने लगा। निशा का शरीर अकड़ गया।

जोर से काँपते हुए वह चरम पर पहुँची। अंदर की मांसपेशियाँ लंड को बार-बार कस रही थीं। राजू ने भी रुकना बंद किया।

अंतिम तेज धक्कों के साथ गर्म पानी की मोटी धार उसके अंदर छोड़ दी। दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे से चिपके रहे। साँसें अभी भी हाँफ रही थीं।

थोड़ी देर बाद दोनों ने धीरे-धीरे कपड़े सँभालने शुरू किए। निशा के गाल लाल थे। शरीर अभी भी काँप रहा था।

निशा के चेहरे पर शर्म थी। “ये गलत हो गया। मेरी शादी है।

तुम्हारी भी। ”राजू ने उसका हाथ पकड़ा। “मैं जानता हूँ भाभी।

लेकिन रुक नहीं पा रहा। ”उसके बाद मुलाकातें बदल गईं। राजू अब कबाड़ के बहाने आता।

गली में आवाज लगाता। निशा दरवाजा खोलती। कभी अंदर बुला लेती।

घर खाली होता तो दोनों बेडरूम में चले जाते। एक दिन राजू ने निशा को घोड़ी बनाकर पीछे से लिया। एक दिन निशा खुद ऊपर बैठकर हिप्स हिलाती रही।

चूचियाँ राजू के मुँह में थीं। वह काट-काट कर चूस रहा था। निशा की चूत से पानी टपक रहा था।

छोटे शहर में बातें छुपती नहीं। पड़ोस की औरत ने राजू को निशा के घर से देर से निकलते देखा। गप शुरू हो गईं।

“कबाड़ी भाभी के घर बहुत देर रुकता है। ” निशा के कान तक बात पहुँची। उसने राजू से कहा, “अब सावधानी से आना।

लोग बातें बनाने लगे हैं। ”राजू डर गया लेकिन रुक नहीं पाया। एक सुबह गली में ज्यादा भीड़ थी।

राजू ने फिर भी द्वार खटखटाया। निशा ने अंदर बुलाया। दरवाजा बंद होते ही दोनों लिपट गए।

इस बार और बेकाबू। राजू ने निशा को दीवार से सटाया। चूत में लंड डालकर जोर-जोर से धक्के लगाए।

निशा की एक टाँग उसकी कमर पर थी। चूचियाँ उसके हाथों में मसली जा रही थीं। “तुमने मुझे पागल कर दिया,” निशा कराह रही थी।

रात को निशा अकेली लेटी रही। शरीर में राजू की गर्मी थी। पति का फोन आया।

सामान्य बातें हुईं। निशा ने हां में हां मिलाई लेकिन मन कहीं और था। डर भी था।

अगर पकड़ी गई तो क्या होगा। एक दिन पड़ोस की औरत ने सीधा पूछ लिया, “वह कबाड़ी तुम्हारे घर इतनी देर क्यों रहता है? ” निशा ने टाल दिया।

लेकिन दिल बैठ गया। उसने राजू से कहा, “अब कम आना। ”राजू माना नहीं।

अगली सुबह फिर आया। निशा ने दरवाजा खोला तो गुस्से में थी। “मैंने कहा था न…” राजू ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“एक बार आखिरी…” निशा विरोध नहीं कर सकी। दोनों बेडरूम में गए। राजू ने निशा की चूत चाटी।

जीभ अंदर तक डालकर चाटा। निशा की जाँघें काँप रही थीं। फिर उसने निशा को घुटनों के बल किया।

गांड के गाल फैलाए। थूक लगाकर लंड गांड में धीरे-धीरे डाला। निशा चीख पड़ी।

“आह… दर्द… लेकिन मत निकाल…” राजू ने पूरा अंदर कर दिया और जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। निशा की चूचियाँ बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं। अंत में दोनों एक साथ काँप उठे।

गली में अब खुली बातें होने लगीं। निशा के पति तक खबर पहुँची। वह अचानक घर आ गया।

निशा और राजू उस समय घर में थे। पति ने दरवाजा खोला। तीनों के चेहरे सफेद पड़ गए।

राजू ने कपड़े सँभाले और भाग निकला। पति चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “अब तुम बताओ क्या चल रहा था।

”निशा रोने लगी। पति ने सिर्फ इतना कहा, “मैं बाहर रहता हूँ। तुम घर में… ये सब?

” वह रात भर चुप रहा। सुबह कहा, “या तो सब बंद करो या मैं कुछ और सोचूँगा। ”निशा ने राजू से मिलने से मना कर दिया।

लेकिन शरीर नहीं माना। एक हफ्ते बाद राजू गली में आवाज लगा रहा था। निशा ने खिड़की से देखा।

दिल धड़क उठा। दो दिन बाद उसने राजू को इशारे से बुलाया। दोनों एक पुराने मकान की कोठरी में मिले।

इस बार और जल्दबाजी में। राजू ने निशा को दीवार से सटाया। चूत में लंड डालकर जोर-जोर से चोदा।

निशा की कराहें दबी थीं। “डर लग रहा है… लेकिन रुक नहीं पा रही…” राजू ने फिर उसे घुटनों के बल किया और गांड में लिया। निशा की चीखें कोठरी में गूंज रही थीं।

छोटे शहर की संकरी गलियाँ सब देख रही थीं। बाजार के दुकानदार, पड़ोसी, दूध वाला—सबकी नजरें थीं। निशा हर सुबह दरवाजा खोलते समय दिल की धड़कन सुनती।

राजू ठेला लेकर निकलता तो गली के मोड़ पर रुककर सोचता। दोनों जानते थे कि ये खेल अब खतरनाक हो चुका है। लेकिन अकेलापन और वो आकर्षण दोनों को बार-बार खींच लाता।

एक शाम निशा के पति ने फिर कहा, “आखिरी चेतावनी है। ” निशा ने सिर हिलाया। लेकिन अगली सुबह राजू के ठेले की आवाज सुनकर उसका शरीर काँप उठा।

वह दरवाजे की तरफ बढ़ी। हाथ दरवाजे के हत्थे पर था। बाहर राजू खड़ा था।

नजरें मिलीं। दोनों कुछ पल खड़े रहे। फिर निशा ने दरवाजा खोला।

राजू अंदर आया। गली में लोग आ-जा रहे थे। लेकिन उस पल दोनों के लिए सिर्फ एक-दूसरे का अस्तित्व रह गया था।

कबाड़ी की वो रोज की आवाज अब सिर्फ रद्दी की नहीं रह गई थी। वह आवाज दो अकेली जिंदगियों की छुपी चाहत बन चुकी थी। चाहत जो शहर की संकरी गलियों में कब तक छुप पाएगी—ये कोई नहीं जानता था।

लेकिन हर सुबह जब राजू ठेला लेकर निकलता तो निशा का दिल उसी आवाज का इंतजार करता। और राजू का ठेला उसी गली में खुद-ब-खुद रुक जाता।

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