कमलेश ने फावड़ा कंधे पर रखा और सरसों के खेत की तरफ बढ़ा। परिवार शहर चला गया था। माँ-बाप बहन के पास।
वह अकेला गाँव में रह गया था। इक्कीस साल का था। घर खाली गूंजता।
रात को सन्नाटा चुभता। दिन में खेत ही सहारा था। लेकिन इस बार मानसून के बाद घास इतनी बढ़ गई थी कि अकेले निराई मुश्किल हो रही थी।
सरसों के पौधे दब रहे थे। कमलेश थक चुका था। तभी मेड़ पर शांती दिखी।
पड़ोस वाली। उम्र चालीस के करीब। पति दिनभर दूसरे गाँव मजदूरी करता।
बेटा शहर में। शांती अक्सर पड़ोसियों की मदद कर देती थी। खेत-खलिहान का काम अच्छी तरह जानती थी।
“क्या हुआ कमलेश? अकेले निराई कर रहे हो? ” शांती ने पूछा।
“हाँ चाची। घास बहुत हो गई। अकेला नहीं निपट पा रहा।
”शांती ने साड़ी का पल्लू ठीक किया। “कल सुबह आ जाऊँगी। साथ में कर लेंगे।
तुम्हारे बाप-दादा का खेत है। यूँ नहीं छोड़ सकते। ”कमलेश ने सिर हिलाया।
“मेहरबानी होगी चाची। ”अगली सुबह शांती समय पर पहुँच गई। हाथ में अपना फावड़ा।
दोनों खेत में उतरे। सरसों के पौधे घुटनों तक। पीले फूल जगह-जगह खिल रहे थे।
घास निकालते हुए बातें होने लगीं। शांती पूछती, “खाना बना लेते हो न? अकेले कैसे रहते हो?
” कमलेश जवाब देता, “बना लेता हूँ। लेकिन स्वाद नहीं आता। ”दोनों की साँसें तेज हो रही थीं।
धूप बढ़ रही थी। शांती की साड़ी पसीने से शरीर से चिपक गई थी। कमलेश की नजर कभी-कभी उसके उभार पर चली जाती।
वह जल्दी से नजर हटा लेता। शांती भी उसका मजबूत शरीर देख लेती। युवा था।
कंधे चौड़े। अकेलापन दोनों को छू रहा था। दोपहर को शांती ने अपने घर से रोटी-अचार लाई।
मेड़ पर बैठकर खाया। “तुम्हारी माँ अच्छी थी। उन्हें याद करती हूँ,” शांती ने कहा।
कमलेश चुप रहा। हवा में सरसों की हल्की खुशबू तैर रही थी। शांती ने अचानक पूछा, “रात को डर नहीं लगता अकेले?
”“लगता है चाची। लेकिन आदत पड़ गई। ”शांती ने धीरे से मुस्कुराया।
“अगर कभी जरूरत हो तो बता देना। ”अगले तीन दिन लगातार दोनों ने साथ निराई की। बातें और गहरी होती गईं।
शांती बताती अपने पति की थकान की, कैसे वह रात को थककर सो जाता है, बात भी नहीं करता। कमलेश बताता रात के सन्नाटे की, कैसे घर की दीवारें गूंजती हैं। एक दिन शांती ने कहा, “तुम अकेले कैसे सो जाते हो इतने बड़े घर में?
” कमलेश ने हँसकर जवाब दिया, “आदत पड़ गई चाची। ” लेकिन आँखों में अकेलापन साफ था। पाँचवें दिन निराई लगभग पूरी हो चुकी थी।
दोनों मेड़ पर बैठे थे। सरसों के फूल हवा में झूम रहे थे। शांती ने अचानक कमलेश का हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें देखकर लगता है जैसे मेरे बेटे की उम्र का हो। लेकिन… कभी-कभी कुछ और भी लगता है। ”कमलेश का दिल तेज धड़कने लगा।
उसने हाथ नहीं छुड़ाया। शांती की हथेली गर्म थी। सरसों के फूलों के बीच सन्नाटा था।
शांती ने धीरे से कहा, “मेरा पति थककर आता है। बात भी नहीं करता। तुम… तुम सुनते हो।
”कमलेश ने उसका हाथ अपनी हथेली में ले लिया। “मैं भी अकेला हूँ चाची। ”शांती मुस्कुराई।
“चाची मत कहो अब। ”उस दिन दोनों देर तक बैठे रहे। जब शांती उठने लगी तो कमलेश ने उसका हाथ फिर पकड़ लिया।
नजरें मिलीं। शांती ने धीरे से अपना पल्लू हटाया। कमलेश ने उसे अपनी तरफ खींचा।
होठों पर होठ रख दिए। चुंबन पहले धीमा था, फिर गहरा होता गया। शांती के हाथ उसके बालों में उलझ गए।
कमलेश का हाथ उसकी कमर पर था। फिर धीरे-धीरे ऊपर सरककर चूची पर आ गया। साड़ी के ऊपर से दबाया।
शांती की कराह दब गई। “यहाँ कोई आ सकता है,” शांती ने फुसफुसाया। “अभी कोई नहीं आता,” कमलेश ने जवाब दिया।
उसने ब्लाउज के ऊपर से ही उसकी बड़े बड़े चूचियों को दबाने लग। फिर उसने एक झटके में ब्लाउज और ब्रा दोनों निकल फेका।
कमलेश से उसकी बड़ी बड़ी गोरी चूचिया देखि नहीं गयी और कमलेश ने दोनों को हाथों में लिया और मसलने लगा। निप्पल मुँह में ले लेकर चूसा। शांती की कमर ऐंठ गई।
“आह… धीरे…”कमलेश ने उसे सरसों के पौधों के बीच लिटा दिया। साड़ी ऊपर की। पैंटी खींचकर उतार दी।
चूत पर उँगलियाँ फेरने लगा। चुत पूरी गीली हो चुकी थी। कमलेश ने झुककर अपनी जीभ उसकी बड़ी फुली हुयी चुत पर रखकर चाटने लगा।
शांती की टाँगें काँपने लगीं। फिर कमलेश ने अपना लंड निकाला। मोटा और सख्त।
चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे धकेला। शांती की आँखें बंद हो गईं। “बहुत दिन बाद… पूरा डालो…”कमलेश पूरा अंदर तक चला गया।
फिर धक्के लगाने लगा। सरसों के पौधे उनके शरीर से रगड़ खा रहे थे। हर धक्के के साथ शांती की चूचियाँ हिल रही थीं।
कमलेश ने उन्हें मुँह में ले रखा था। शांती के नाखून उसकी पीठ पर चिपक गए। “जोर से… और जोर से…” कमलेश ने गति बढ़ा दी।
शांती काँपते हुए झड़ गई। कमलेश ने भी उसके अंदर ही छोड़ दिया। दोनों जल्दी से कपड़े पहनने लगे।
शांती के चेहरे पर शर्म थी। “ये गलत है। मेरी शादी है।
”कमलेश ने उसका हाथ पकड़ा। “मैं जानता हूँ। लेकिन रुक नहीं पा रहा।
”अगले दिनों में निराई के बहाने मुलाकातें जारी रहीं। खेत अब साफ था लेकिन दोनों रोज आते। कभी मेड़ पर बैठकर लंबी बातें करते।
शांती बताती अपनी जवानी की बातें, कैसे पहले पति के साथ हँसी-खेल होती थी। कमलेश बताता शहर जाने की इच्छा की लेकिन गाँव छोड़ नहीं पा रहा। एक दिन शांती ने कमलेश के घर का खाना चखने का बहाना किया।
घर के अंदर दोनों फिर लिपट गए। इस बार बिस्तर पर। कमलेश ने शांती की चूचियाँ देर तक चूसीं।
निप्पल काटे। फिर चूत चाटी। जीभ अंदर तक डालकर चाटा।
शांती की जाँघें काँप रही थीं। “आह… वहाँ… और चाटो…”फिर कमलेश ने शांती को घोड़ी बना दिया। पीछे से लंड चूत में डाला।
जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। शांती की चूचियाँ बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं। कमलेश ने उसकी कमर पकड़कर और तेज कर दिया।
शांती जोर से कराह उठी और झड़ गई। कमलेश ने भी उसके अंदर छोड़ दिया। गाँव में हल्की गप शुरू हो गईं।
किसी ने दोनों को खेत में देर तक देखा। किसी ने शांती को कमलेश के घर की तरफ जाते देखा। शांती के पति तक बात पहुँची।
उसने पत्नी से पूछा। शांती ने टाल दिया। लेकिन डर बैठ गया।
रात को पति ने कहा, “उस लड़के से ज्यादा बात मत करना। ” शांती चुप रही। एक दोपहर खेत में दोनों फिर मिले।
इस बार शांती खुद कमलेश के करीब गई। “आज पूरा समय है। पति दूसरे गाँव गया है।
” कमलेश ने उसे कसकर पकड़ लिया। कपड़े उतरे। कमलेश ने शांती को सरसों के पौधों के बीच लिटाया।
पहले चूत को देर तक चाटा। दो उँगलियाँ डालकर अंदर-बाहर किया। शांती की टाँगें हवा में थीं।
फिर उसने शांती को घुटनों के बल किया। गांड के गाल फैलाए। थूक लगाकर लंड गांड में धीरे-धीरे डाला।
शांती चीख पड़ी। “आह… दर्द… लेकिन मत निकाल… पूरा डालो…” कमलेश ने पूरा अंदर कर दिया और जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। शांती की चूचियाँ मिट्टी पर रगड़ खा रही थीं।
हर धक्के के साथ उसकी गांड काँप रही थी। अंत में दोनों एक साथ काँप उठे। कमलेश ने गांड की गहराई में ही छोड़ दिया।
रात को शांती घर लौटी तो पति बैठा था। “आज फिर खेत गई थी? ” उसने पूछा।
शांती ने हाँ कहा। पति चुप रहा। लेकिन आँखों में शक था।
उसने आगे कहा, “गाँव में बातें होने लगी हैं। ध्यान रखना। ”कमलेश अकेले घर में लेटा रहा।
शरीर में शांती की गर्मी थी। अकेलापन अब और चुभ रहा था। वह चाहता था शांती उसके साथ रहे।
लेकिन शांती की शादी और गाँव की नजरें बीच में थीं। अगली सुबह वह खेत गया तो शांती पहले से खड़ी थी। दोनों बिना बात किए पौधों के बीच चले गए।
इस बार शांती ने खुद कमलेश का लंड निकाला और मुँह में ले लिया। जोर से चूसा। गले तक समेटा।
कमलेश के हाथ उसके बालों में थे। फिर शांती लेट गई। कमलेश ने उसकी टाँगें कंधों पर रखीं और चूत में पूरा लंड डालकर जोर-जोर से चोदा।
शांती की कराहें दबी हुई थीं। “तुमने मुझे बर्बाद कर दिया कमलेश… लेकिन रोक मत…”मुलाकातें और गहरी होती गईं। कभी खेत में, कभी कमलेश के खाली घर में।
एक दिन शांती ने कहा, “मेरा पति मुझसे दूर होता जा रहा है। तुम… तुम पास हो। ” कमलेश ने उसे गले लगा लिया।
दोनों ने उस दिन घंटों तक एक-दूसरे को लिया। कमलेश ने शांती की चूचियाँ मसलीं, चूसीं, काटीं। चूत चाटी।
फिर गांड में लंड डाला। शांती घोड़ी बनी रही। कमलेश पीछे से जोर-जोर से धक्के लगाता रहा।
दोनों कई बार झड़े। गप अब जोर पकड़ने लगीं। शांती के पति ने कमलेश से सीधा कहा, “मेरी औरत के पीछे मत पड़ो।
वरना ठीक नहीं होगा। ” कमलेश चुप रहा। शांती रोती रही।
लेकिन दोनों रुक नहीं पाए। एक रात शांती चुपके से कमलेश के घर आ गई। दरवाजा बंद होते ही दोनों लिपट गए।
इस बार और बेकाबू। कमलेश ने शांती को दीवार से सटाया। चूत में लंड डालकर जोर-जोर से धक्के लगाए।
शांती की एक टाँग उसकी कमर पर थी। फिर बिस्तर पर लिटाकर गांड में लिया। शांती की कराहें दबी हुई थीं।
“तुमने मुझे पागल कर दिया,” वह बार-बार कह रही थी। कमलेश ने उसकी गांड फैलाकर देखा और फिर से लंड डाल दिया। देर तक चोदता रहा।
सुबह होते-होते शांती घर लौट गई। लेकिन गाँव वाले सुन चुके थे। अगले दिन कई औरतें शांती के घर इकट्ठा हो गईं।
बातें कटु हुईं। शांती के पति ने कहा, “या तो घर छोड़ो या उस लड़के को। ”शांती ने कमलेश से मिलकर कहा, “अब नहीं मिल सकते।
सब खत्म हो जाएगा। ”कमलेश ने उसका हाथ पकड़ा। “मैं अकेला नहीं रह सकता।
तुम भी नहीं रह सकतीं। ”दोनों खेत में खड़े थे। सरसों के फूल झड़ने लगे थे।
फसल कटने वाली थी। शांती की आँखों में आँसू थे। कमलेश ने उसे अंतिम बार कसकर पकड़ लिया।
खेत की मेड़ पर दोनों ने फिर एक-दूसरे को लिया। इस बार धीरे-धीरे, जैसे आखिरी बार हो। कमलेश ने शांती की चूचियाँ चूसीं।
चूत चाटी। फिर लंड अंदर डाला। आँखें मिलाए रखा।
जब दोनों झड़े तो शांती रो पड़ी। फिर कमलेश ने उसे घुटनों के बल किया और गांड में भी ले लिया। शांती की चीखें दबी रहीं।
“ये आखिरी बार है… पूरा ले लो…”“ये खेत हमें मिलाएगा या बिछाड़ेगा… पता नहीं,” शांती ने कहा। कमलेश चुप रहा। सरसों के खेत में खड़े-खड़े दोनों जानते थे कि अब रास्ता मुश्किल हो चला है।
गाँव की गप, पति का गुस्सा, अकेलापन और वो आकर्षण जो रुकने वाला नहीं था—सब एक साथ खड़े थे। फसल कट गई। खेत खाली हो गया।
लेकिन कमलेश और शांती के मन का खेत अभी भी हरा था। जिसमें घास की जगह अब एक अनजानी चाहत उग आई थी। चाहत जो दोनों को लज्जा भी दे रही थी और सुकून भी।
शांती कभी-कभी रात को खिड़की से कमलेश के घर की तरफ देखती। कमलेश खेत की खाली मेड़ पर बैठकर उसकी याद में खोया रहता। एक शाम शांती फिर खेत आई।
कमलेश वहाँ था। दोनों बिना बात किए पास आए। इस बार कोई जल्दबाजी नहीं थी।
सिर्फ भावना थी। कमलेश ने शांती का चेहरा दोनों हाथों में लिया। “चाची… नहीं… शांती… मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।
”शांती ने सिर उसके सीने पर रख दिया। “मैं भी नहीं… लेकिन कैसे? ”दोनों खेत की मिट्टी पर बैठ गए।
बातें लंबी चलीं। भविष्य की, डर की, चाहत की। फिर धीरे-धीरे कपड़े खुले।
इस बार प्रेम से। कमलेश ने शांती के पूरे शरीर को चूमा। चूचियों से लेकर जाँघों तक।
चूत को देर तक चाटा। फिर लंड अंदर डाला। धीरे-धीरे धक्के लगाए।
आँखें मिलाए रखा। शांती की आँखों से आँसू बह रहे थे। अंत में दोनों लिपट कर लेटे रहे।
आगे क्या होगा—ये फैसला अभी बाकी था। लेकिन सरसों के उस खेत ने जो बीज बोया था, वह आसानी से सूखने वाला नहीं था। गाँव की धूल, पति का साया और दोनों का अकेलापन अब एक नए रिश्ते की नींव बन चुका था।
चाहे वो रिश्ता छुपकर ही क्यों न चलना पड़े।