सुबह का उजाला अभी खेतों तक पूरा नहीं पहुँचा था। सावित्री ने अपने सिर पर पल्लू ठीक किया और घर से निकली। हाथ में लोटा था, कंधे पर फावड़े जैसी चीज।
गाँव के किनारे वाले खेत तक रोज की तरह पैदल जाना था। पति रामू अभी सो रहा था। रात को देर तक ताश खेलकर आया था।
रास्ते में ननद कमला भी मिल गई। “आज जल्दी निकली दीदी? ” कमला ने पूछा।
“खेत में पानी लगाना है। तुम कहाँ? ” सावित्री ने जवाब दिया।
दोनों साथ-साथ चलने लगीं। रास्ता कच्चा था। एक तरफ सरसों के खेत, दूसरी तरफ ऊख।
तभी पीछे से मोटरसाइकिल की आवाज आई। तेज रफ्तार। मोड़ पर पहिया फिसला।
सवार संभल नहीं पाया। मोटरसाइकिल लड़खड़ाई और वह जमीन पर गिर पड़ा। सावित्री और कमला दौड़ीं।
युवक कराह रहा था। माथे पर खून लग गया था। उम्र तीस के करीब।
साफ कपड़े, जैसे शादी-ब्याह से लौट रहा हो। “क्या हुआ? ” सावित्री ने झुककर पूछा।
“फिसल गई… हाथ में चोट आ गई,” उसने दर्द भरी आवाज में कहा। कमला ने पानी का लोटा दिया। सावित्री ने अपने पल्लू से उसके माथे का खून पोंछा।
नजदीक से देखा तो उसकी आँखें गहरी थीं। सावित्री का हाथ उसके माथे पर रुक गया। एक पल के लिए नजरें मिलीं।
फिर सावित्री ने जल्दी से हाथ हटा लिया। “नाम क्या है तुम्हारा? ” कमला ने पूछा।
“मनन। पास वाले गाँव का। शादी से लौट रहा था।
”दोनों ने उसे उठाया। मोटरसाइकिल किनारे लगाई। मनन लंगड़ाते हुए चला।
सावित्री का कंधा उसके हाथ के नीचे था। शरीर गर्म था। सावित्री को अजीब सा अहसास हुआ।
घर तक छोड़ने की बजाय उन्होंने उसे अपने खेत की मेड़ पर बिठाया। थोड़ी देर आराम करने को कहा। मनन ने पानी पिया।
“तुम्हारा नाम? ” उसने सावित्री से पूछा। “सावित्री।
”“धन्यवाद सावित्री। अगर तुम दोनों न होतीं तो…”कमला पास में ही खड़ी थी। बातें सामान्य रहीं।
फिर मनन चला गया। सावित्री खेत में काम करने लगी। लेकिन दिमाग में बार-बार वह गिरने का दृश्य और उसकी आँखें घूम रही थीं।
अगले दिन सुबह सावित्री फिर अकेली जा रही थी। खेत के पास मनन खड़ा था। मोटरसाइकिल ठीक करके लाया था।
“कल का कर्ज चुकाने आया हूँ,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। हाथ में मिठाई की डली थी। सावित्री ने लिया।
“जरूरत नहीं थी। ”“जरूरत नहीं, इच्छा थी। ” मनन की नजर उसके चेहरे पर थी।
फिर गर्दन पर, फिर साड़ी के उभार पर। सावित्री ने पल्लू खींच लिया। दिल तेज धड़कने लगा।
उस दिन से मनन अक्सर खेत के रास्ते मिलने लगा। कभी पानी माँगने के बहाने, कभी रास्ता पूछने के। बातें बढ़ने लगीं।
दोनों शादीशुदा थे। मनन की पत्नी का नाम गीता था। सावित्री के पति रामू।
लेकिन बातों में अकेलापन झलकता। मनन कहता उसकी पत्नी घर के काम में उलझी रहती। सावित्री कहती रामू रात को देर से आता।
एक सुबह खेत में कोई नहीं था। मनन करीब आया। “तुम्हें देखकर दिल नहीं भरता।
”सावित्री ने मुँह फेर लिया। “ऐसी बातें मत करो। दोनों की इज्जत है।
”मनन ने उसका हाथ पकड़ लिया। “इज्जत से ज्यादा कुछ और भी होता है। ”सावित्री ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की लेकिन मनन ने कस लिया।
खेत की मेड़ पर दोनों खड़े थे। सरसों के पौधे आसपास। मनन ने उसे अपनी तरफ खींचा और होठों पर होठ रख दिए।
सावित्री की साँस रुक गई। विरोध का शब्द मुँह तक आया लेकिन निकला नहीं। चुंबन गहरा होता गया।
मनन का हाथ उसकी कमर पर था। फिर धीरे-धीरे ऊपर सरककर चूची पर आ गया। साड़ी और ब्लाउज के ऊपर से दबाया।
सावित्री की कराह दब गई। “यहाँ कोई देख लेगा,” सावित्री ने फुसफुसाया। “कोई नहीं आता इतनी सुबह,” मनन ने जवाब दिया और ब्लाउज के हुक खोलने लगा।
चूचियाँ बाहर आ गईं। उसने दोनों को हाथों में लिया और मसलने लगा। निप्पल सख्त हो चुके थे।
झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। सावित्री की कमर ऐंठ गई। “आह… मनन…”मनन ने साड़ी ऊपर की।
पैंटी के ऊपर से चूत को सहलाया। गीली हो चुकी थी। पैंटी खींचकर उतार दी।
दो उँगलियाँ चूत में डाल दीं। सावित्री की टाँगें काँपने लगीं। मनन ने उसे मेड़ पर लिटा दिया।
जाँघें फैलाईं और अपना लंड निकाला। मोटा और सख्त। चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे धकेला।
सावित्री की आँखें बंद हो गईं। “धीरे… बहुत दिन बाद…”मनन पूरा अंदर तक चला गया। फिर धक्के लगाने लगा।
पहले धीरे, फिर तेज। हर धक्के के साथ सावित्री की चूचियाँ हिल रही थीं। खेत की मिट्टी उनके शरीर से चिपक रही थी।
सावित्री के मुँह से दबी कराहें निकल रही थीं। मनन ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और और गहराई तक गया। सावित्री काँपते हुए झड़ गई।
मनन ने भी उसके अंदर ही छोड़ दिया। दोनों जल्दी से कपड़े पहनने लगे। सावित्री के चेहरे पर शर्म और सुख दोनों थे।
“अब ऐसा नहीं होगा,” उसने कहा। मनन मुस्कुराया। “अब रुक नहीं पाएगा।
”गाँव में बातें फैलने में समय नहीं लगता। किसी ने दोनों को खेत की तरफ जाते देखा। किसी ने मनन की मोटरसाइकिल बार-बार उसी रास्ते पर देखी।
गप शुरू हो गईं। सावित्री के पति रामू तक हल्की बात पहुँची। उसने पत्नी से पूछा।
सावित्री ने टाल दिया। लेकिन मुलाकातें जारी रहीं। कभी खेत में, कभी पुराने कुएँ के पास।
एक दिन मनन ने सावित्री को घोड़ी बनाकर पीछे से लिया। एक दिन सावित्री खुद ऊपर बैठकर हिप्स हिलाती रही। चूचियाँ मनन के मुँह में थीं।
वह काट-काट कर चूस रहा था। सावित्री की चूत से पानी टपक रहा था। फिर एक दिन मनन की पत्नी गीता को शक हो गया।
उसने मनन का फोन चेक किया। एक मैसेज मिला—“कल सुबह खेत में आना। अकेली रहूँगी।
” गीता का खून खौल गया। उसने मनन से पूछा। मनन टाल गया।
गीता चुप रही लेकिन अंदर आग जल रही थी। अगली सुबह गीता ने पीछा किया। खेत के किनारे छिपकर देखा।
सावित्री और मनन दोनों नंगे थे। मनन सावित्री की चूत चाट रहा था। जीभ अंदर तक डाले हुए।
सावित्री कराह रही थी। फिर मनन ने लंड अंदर डाल दिया और जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। गीता की आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे।
लेकिन साथ में एक अजीब सी जलन भी। वह खड़ी देखती रही। मनन की ताकत, सावित्री की कराहें—सब देख लिया।
शाम को घर पहुँचकर गीता ने मनन का सामना किया। “मैंने सब देख लिया। उस औरत के साथ…”मनन चुप रहा।
गीता चीखने लगी। थप्पड़ मारा। “शादी तोड़ दूँगी।
गाँव में बेइज्जत कर दूँगी। ”रात भर गीता रोती रही। लेकिन गुस्से के साथ कुछ और भी था।
मनन की वह ताकत, वह पागलपन जो उसने कभी उसके साथ नहीं दिखाया था। जलन हो रही थी। अगले दिन गीता ने सावित्री से मिलने का फैसला किया।
खेत में दोनों आमने-सामने हुईं। गीता की आवाज काँप रही थी। “तुमने मेरा पति छीन लिया।
”सावित्री ने सिर झुकाया। “माफ करना। हम दोनों गलत थे।
”गीता करीब आई। “गलत? मैंने देखा तुम दोनों को।
तुम्हारी कराहें… मनन तुम्हें कैसे ले रहा था…” आवाज में गुस्से के साथ जिज्ञासा भी थी। “वह मेरे साथ कभी ऐसा नहीं करता। ”सावित्री हैरान रह गई।
गीता की आँखों में सिर्फ गुस्सा नहीं था। कुछ और था। उस रात गीता ने मनन से कहा, “मुझे भी वैसा ही चाहिए जैसा तुम उससे करते हो।
”मनन चौंक गया। गीता ने खुद उसके कपड़े उतरवाए। लंड को मुँह में लिया और जोर से चूसा।
फिर बिस्तर पर लेट गई। “आज वैसा ही चोदो जैसे उसे चोदा था। ” मनन ने हिचकिचाते हुए लेकिन जोर से धक्के लगाए।
गीता कराह रही थी। पहली बार इतनी बेकाबू। लेकिन जलन खत्म नहीं हुई।
गीता ने एक दिन दोनों को फिर खेत में बुलाया। “आज मैं भी वहाँ रहूँगी। ”सावित्री और मनन हैरान थे।
लेकिन गीता अड़ी रही। खेत की मेड़ पर तीनों थे। सरसों के पौधों के बीच।
गीता ने कहा, “मुझे दिखाना। कैसे लेते हो उसे। आज दोनों की गांड में लेना।
घोड़ी बनाकर। ”मनन की साँस तेज हो गई। सावित्री के चेहरे पर शर्म थी लेकिन शरीर काँप रहा था।
गीता ने खुद अपने कपड़े उतारे। फिर सावित्री के भी। तीनों नंगे खड़े थे।
मनन का लंड पहले से सख्त हो चुका था। गीता ने सावित्री को घुटनों के बल कर दिया। खुद भी उसके बगल में उसी हालत में बैठ गई।
दोनों की गांडें हवा में उठी हुई थीं। गुलाबी छेद साफ दिख रहे थे। मनन ने पहले सावित्री की गांड के दोनों गालों को फैलाया।
थूक का बड़ा सा ढेर छेद पर गिराया। उँगली घुमाकर अंदर तक ले गया। सावित्री कराह उठी।
“आह… धीरे…” मनन ने दो उँगलियाँ डाल दीं। अंदर-बाहर किया। छेद खुलने लगा।
फिर उसने अपना मोटा लंड सावित्री की गांड पर रखा और जोर से धकेला। सिरा अंदर घुस गया। सावित्री चीख पड़ी।
“आह… गांड फट रही है…” मनन ने रुके बिना पूरा लंड अंदर धँस दिया। अंडकोष उसकी गांड से टकरा गए। फिर उसने पागलों की तरह धक्के लगाने शुरू कर दिए।
हर धक्के के साथ सावित्री की गांड की चमड़ी लहराने लगी। चूचियाँ नीचे लटककर हिल रही थीं। मनन एक हाथ से उसकी चूत में उँगलियाँ डाले हुए था।
“ले मेरी गांड… पूरी ले…” सावित्री रोते-रोते कराह रही थी। थोड़ी देर बाद मनन ने लंड निकाला। सावित्री की गांड का छेद खुला और लाल हो चुका था।
पानी जैसा चिकनापन बह रहा था। अब गीता की बारी थी। मनन ने गीता की गांड के गालों को फैलाया।
जीभ से छेद को जोर से चाटा। थूक डाला। दो उँगलियाँ अंदर तक घुसा दीं।
गीता की आवाज निकल गई। “आह… अंदर… और अंदर…” मनन ने उँगलियाँ निकालकर मोटा लंड गीता की गांड पर रखा और एक झटके में आधा अंदर कर दिया। गीता चीख पड़ी।
“इतना मोटा… गांड फाड़ देगा…” मनन ने पूरा लंड धकेल दिया। फिर उतनी ही जोर से धक्के लगाने लगा जितने सावित्री को लगाए थे। गीता की गांड जोर-जोर से काँप रही थी।
चूचियाँ मिट्टी पर रगड़ खा रही थीं। मनन ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और तेज गति से गांड चोदने लगा। फिर मनन ने दोनों को बारी-बारी लेना शुरू किया।
कभी सावित्री की गांड में पूरा लंड डालकर दस-बारह जोरदार धक्के, फिर निकालकर गीता की गांड में उतनी ही ताकत से। दोनों की गांडें लाल और सूजी हुई थीं। छेद खुले हुए थे।
मनन के लंड पर दोनों की चिकनाहट चमक रही थी। सावित्री और गीता एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए कराह रही थीं। “और जोर से… दोनों की गांड फाड़ दो…” मनन कभी एक की गांड में उँगलियाँ डालता तो दूसरी को लंड से चोदता।
कभी दोनों की चूचियाँ एक साथ मसलता। खेत की मिट्टी उनके घुटनों से चिपक रही थी। पसीना बह रहा था।
आखिर में मनन ने दोनों को पास-पास घुटनों के बल कर दिया। पहले सावित्री की गांड में पूरा लंड डालकर जोर-जोर से बीस धक्के लगाए। सावित्री का शरीर अकड़ गया।
वह जोर से झड़ गई। चूत से पानी की धार छूटी। फिर तुरंत लंड निकालकर गीता की गांड में पूरा धँस दिया।
उतनी ही बेकाबू गति से चोदने लगा। गीता भी काँपते हुए चरम पर पहुँची। मनन ने दोनों की गांडें फैलाए रखकर आखिरी जोरदार धक्के लगाए और गीता की गांड की गहराई में ही सब छोड़ दिया।
गर्म पानी इतना निकला कि बाहर बहकर जाँघों पर आ गया। फिर उसने बचा हुआ हिस्सा सावित्री की खुली गांड में डाल दिया। तीनों थककर मेड़ पर गिर गए।
सावित्री और गीता की गांडें अभी भी खुली हुई थीं। छेद से मनन का पानी रिस रहा था। दोनों की साँसें हाँफ रही थीं।
मनन बीच में लेटा हुआ दोनों की चूचियाँ सहला रहा था। गाँव में अब और तेज गप फैलने लगीं। तीनों के रिश्ते बदल चुके थे।
रामू को हल्की खबर पहुँची तो उसने सावित्री से दूरी बना ली। मनन और गीता के बीच अब गुस्से की जगह एक अजीब सा समझौता था। कभी गीता खुद सावित्री को घर बुला लेती।
तीनों बिस्तर पर होते। मनन बारी-बारी चोदता। कभी सावित्री गीता की चूत चाटती तो कभी गीता सावित्री की।
गांड भी नियमित हो गई थी। हर बार घोड़ी बनाकर दोनों की गांड में बारी-बारी लेना अब उनकी आदत बन चुका था। लेकिन परिणाम भी आए।
गाँव वाले दूर करने लगे। रामू ने सावित्री को मायके भेजने की बात कही। गीता के मायके वालों ने भी खबर ले ली।
तीनों के बीच अब सिर्फ शरीर की भूख बाकी रह गई थी या कुछ और भी—ये कोई नहीं जानता था। एक सुबह सावित्री फिर खेत जा रही थी। मनन और गीता दोनों रास्ते में मिले।
तीनों ने एक-दूसरे को देखा। कोई कुछ नहीं बोला। लेकिन आँखों में सब कुछ था—गुनाह, लालसा, जलन और एक अजीब सा बंधन जो अब टूटने वाला नहीं लग रहा था।
खेत की उस सुबह की दुर्घटना ने सिर्फ दो लोगों को नहीं, तीन जिंदगियों को हमेशा के लिए बदल दिया था। गाँव की धूल में ये राज़ अब और गहरा हो चुका था।
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