ट्रेन की तीन रातें और अकेली भाभी – Train Bhabhi Hindi Adult Story

इस train bhabhi Hindi adult story की शुरुआत पटना स्टेशन से होती है। पटना जंक्शन पर भीड़ इतनी थी कि साँस लेना भी मुश्किल लग रहा था। अरविंद ने अपना बैग कसकर पकड़ा और कोच की तरफ बढ़ा।

टिकट में बर्थ नंबर अचानक बदल गया था। लास्ट मिनट में टीटी ने कहा था कि साइड लोअर खाली है। अरविंद शादीशुदा था।

पत्नी पटना में ही रहती। केरल में कंपनी का प्रोजेक्ट था। तीन रात का सफर।

कोच में घुसते ही ठंडी हवा लगी। एसी थ्री टियर। पर्दे लगे हुए।

अरविंद ने अपनी बर्थ ढूँढी। साइड लोअर। सामने वाली बर्थ पर एक औरत बैठी थी।

उम्र तीस के आसपास। साड़ी पहने। बाल बाँधे हुए।

चेहरे पर थकान लेकिन आँखें चमकदार। “यह बर्थ खाली है न? ” अरविंद ने पूछा।

औरत ने सिर हिलाया। “हाँ। मेरी साइड अपर है।

लेकिन सामान रखने में मदद चाहिए थी। ”अरविंद ने बैग ऊपर रखा। औरत का नाम पूछा तो उसने कहा, “मैं कविता।

कोच्चि जा रही हूँ। घरवाले वहाँ हैं। ”अरविंद ने भी अपना परिचय दिया।

दोनों अनजान थे। ट्रेन चली तो खिड़की से पटना के लाइटें पीछे छूटने लगीं। रात का खाना आया।

दोनों ने चुपचाप खाया। फिर अरविंद ने पूछा, “केरल पहली बार जा रही हैं? ”कविता ने जवाब दिया, “नहीं।

शादी के बाद से कई बार। लेकिन हर बार सफर लंबा लगता है। पति खाड़ी में रहते हैं।

साल भर से ज्यादा हो गया घर नहीं आए। ”बातें बिहार की गर्मी से शुरू हुईं। केरल की बारिश पर जा पहुँचीं।

परिवार की जिम्मेदारियों का जिक्र हुआ। अरविंद ने बताया कि पत्नी घर सँभालती है। दोनों की आवाज में अकेलापन छुपा था लेकिन कोई खुलकर नहीं बोला।

रात गहरी हुई। ट्रेन के पहियों की आवाज लगातार चल रही थी। चाय वाला आया।

दोनों ने चाय ली। पर्दे के अंदर अंधेरा था। कविता ने अचानक कहा, “रात में नींद नहीं आती इन सफरों में।

ख्याल बहुत आते हैं। ”अरविंद ने सहमति में सिर हिलाया। “मुझे भी।

घर छोड़कर जाते समय अजीब लगता है। ”बातें यहीं रुकीं। दोनों अपनी बर्थ पर लेट गए।

लेकिन नींद देर से आई। दूसरी सुबह ट्रेन मध्य प्रदेश के स्टेशनों से गुजर रही थी। यात्री बदल रहे थे।

कुछ उतरे। कुछ चढ़े। अरविंद और कविता फिर आमने-सामने बैठे।

अब बातें ज्यादा सहज थीं। कविता हँसने लगी थी। अरविंद भी।

दोपहर में दोनों ने एक-दूसरे के परिवार की और बातें कीं। दोपहर बाद एक बुजुर्ग औरत कोच में चढ़ीं। साइड अपर वाली बर्थ उनकी थी लेकिन चढ़ने में तकलीफ हो रही थी।

कविता ने तुरंत कहा, “आप यहाँ साइड लोअर पर बैठ जाइए। मैं ऊपर चली जाऊँगी। ” बुजुर्ग औरत बैठ गईं।

कविता अरविंद के बगल में साइड लोअर पर खिसक आई। जगह कम थी। दोनों के शरीर सट गए।

ट्रेन की लय में अरविंद का पैर धीरे से कविता के पैर से छू गया। कविता ने नहीं हटाया। अरविंद ने हिम्मत करके अपने पैर की उँगलियों से कविता के नंगे पैर को सहलाना शुरू किया।

कविता की साँस थोड़ी तेज हुई लेकिन वह चुप रही। बुजुर्ग औरत सामने बैठी अखबार देख रही थीं। अरविंद का पैर और ऊपर सरक आया।

साड़ी के अंदर उसकी पिंडली को छूने लगा। कविता ने अपनी टाँग हल्की सी फैलाई। अरविंद का हाथ धीरे से कविता की कमर की तरफ बढ़ा।

साड़ी के ऊपर से उसकी चूची को दबाया। कविता की शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। उसने आँखें बंद कर लीं।

अरविंद ने और साहस किया। अपने पैर की उँगली साड़ी के घने हिस्से में घुसा दी। सीधा बूर के मुँह तक पहुँचा।

गीलापन पहले से था। उँगली ने हल्का सा अंदर दबाया। कविता का शरीर अकड़ गया।

वह काँपते हुए चुपचाप झड़ गई। पानी की गर्मी अरविंद की उँगली पर लग गई। कविता ने प्रतिक्रिया में अपनी टाँग अरविंद की जाँघ पर जोर से दबा दी।

वहाँ उसका मोटा और लंबा लंड तना हुआ महसूस हुआ। दोनों की नजरें एक पल के लिए मिलीं। फिर दोनों ने मुँह फेर लिया।

बुजुर्ग औरत स्टेशन पर उतर गईं। लेकिन अरविंद और कविता ने उसके बाद कुछ और नहीं किया। सिर्फ शरीर में आग सुलग रही थी।

दोनों इंतजार कर रहे थे रात का। बातें कम हो गईं। आँखें बार-बार एक-दूसरे से मिल जातीं।

खाना भी मन से नहीं खाया। शरीर की भूख बातों से ज्यादा भारी पड़ रही थी। रात गहरी हुई।

ट्रेन के डिब्बे में ज्यादातर यात्री सो चुके थे। पर्दे गिरे हुए थे। अरविंद ने धीरे से कविता का हाथ पकड़ा।

कविता ने जवाब में उसका हाथ कस लिया। दोनों एक-दूसरे के करीब खिसक आए। अरविंद ने कविता का चेहरा अपने पास लाया।

होठ मिले। जीभ अंदर तक चली गई। कविता के हाथ अरविंद की छाती पर थे।

अरविंद ने उसकी साड़ी का पल्लू हटाया। ब्लाउज के हुक खोले। नरम चूचियाँ बाहर आ गईं।

उसने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसने लगा। दूसरे को उँगलियों से मसलता रहा। कविता की कराह दब गई।

अरविंद और नीचे गया। पेट पर जीभ फेरी। नाभि को चाटा।

फिर कविता की साड़ी पूरी ऊपर कर दी। पैंटी सरकाई। बूर पूरी तरह भीगी हुई थी।

साल भर से ज्यादा समय बाद किसी ने छुआ था। तंग और गर्म। अरविंद ने मुँह लगा दिया।

जीभ से पूरे बूर को चाटने लगा। क्लिटोरिस को होंठों में लेकर जोर से चूसा। कविता की टाँगें काँपने लगीं।

वह इतनी उत्तेजित हो गई कि उसका हाथ खुद अरविंद के लंड पर चला गया। धोती के ऊपर से मोटे लंड को सहलाने लगी। फिर धोती खोलकर उसे बाहर निकाला।

गर्म और सख्त लंड को अपनी बूर के मुँह पर रगड़ने लगी। अंदर ठेलने की कोशिश करने लगी। अरविंद ने कविता की जाँघें फैलाईं।

मोटे लंड का सिरा तंग बूर पर रखा। धीरे से दबाव दिया। कविता की आँखें फटी रह गईं।

“आह… बहुत तंग… साल भर बाद…” अरविंद ने और धकेला। बूर की दीवारें लंड को जकड़ रही थीं। पूरा अंदर जाने में समय लगा।

दोनों की साँसें रुक गईं। फिर अरविंद ने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। हर धक्के के साथ तंग बूर फैल रही थी।

कविता के नाखून उसकी पीठ में गड़ गए। “जोर से… और गहरा…” अरविंद ने उसकी चूचियाँ मुँह में ले रखीं। निप्पल चूसते हुए गति बढ़ाई।

बर्थ हल्के से काँप रही थी। कविता की तंग बूर पानी छोड़ने लगी। वह जोर से काँपते हुए चरम पर पहुँची।

अरविंद ने भी अपने आप को बाहर खींचते हुए कपड़ों पर छोड़ दिया। दोनों पसीने से तर थे। कविता ने धीरे से कहा, “यह सफर… हमें कहाँ ले आया।

”अरविंद ने उसके बाल सहलाए। “पता नहीं। लेकिन अब पीछे नहीं जा सकते।

”तीसरी रात और भी बेकाबू थी। दोनों जानते थे कि सुबह कोच्चि पहुँच जाएगा। फिर अलग रास्ते।

अंधेरे में फिर लिपट गए। अरविंद ने कविता के पूरे शरीर को चूमा। चूचियाँ देर तक चूसीं।

बूर को फिर जीभ से खोला। क्लिटोरिस इतनी देर चूसा कि कविता दोबारा काँप उठी। फिर लंड अंदर डाला।

इस बार और तेज। कविता ने अपनी टाँगें उसकी कमर पर लपेट लीं। अरविंद ने उसकी गांड के गाल फैलाकर उँगली अंदर डाली।

कविता की आवाज और दब गई। दोनों की साँसें एक हो गईं। अंत में कविता की तंग बूर ने लंड को जकड़ लिया।

अरविंद बाहर निकला और दोनों थककर लेट गए। सुबह की रोशनी खिड़की से फूटी। ट्रेन कोच्चि के करीब थी।

दोनों ने सामान सँभाला। नजरें मिलीं। कोई वादे नहीं।

कोई नंबर नहीं। स्टेशन पर उतरते समय भीड़ में दोनों अलग हो गए। अरविंद प्रोजेक्ट पर लग गया।

लेकिन रात की नींद में ट्रेन की लय गूंजती रही। कविता घर पहुँची। खामोशी में वही तीन रातें चलती रहीं।

दोनों जानते थे कि दोबारा मिलना मुश्किल है। लेकिन पटना से निकली वह ट्रेन उनके अंदर एक ऐसा सफर छोड़ गई जो स्टेशन पर खत्म नहीं हुआ। तंग बूर की गर्मी और मोटे लंड की याद अब दोनों के शरीर में बस चुकी थी।

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