शादीशुदा रितु के बहकते जज़्बात और पड़ोसी की वासना – Hindi Adult Story

सुबह के दस बजे किराने की दुकान पर खड़ी रितु ने अपने हाथ में थैला संभाला। दुकानदार ने चीनी और चायपत्ती का हिसाब बताया तो उसने पैसे निकालते हुए नजर उठाई। सामने वाली गली से राजेश आ रहा था।

वही राजेश जो पिछले सात साल से मोहल्ले में रहता था, जिसका बेटा उसके बेटे के साथ कभी-कभी खेलता था, और जो हमेशा हल्के से सिर हिलाकर नमस्ते कर देता था। आज उसने नमस्ते नहीं किया। उसकी नजर रितु के चेहरे पर ठहर गई, फिर उसके गले के हार पर, और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसक गई।

रितु ने थैला कस लिया। दिल की धड़कन एक पल के लिए तेज हो गई। उसने जल्दी से पैसे रखे और बिना मुड़े घर की तरफ चल दी।

घर आकर उसने थैला रसोई में रखा और खिड़की के पास खड़ी हो गई। राजेश अभी भी गली के मोड़ पर खड़ा था, जैसे कुछ ढूंढ रहा हो। रितु ने पर्दा खींच लिया।

उसका पति अनिल दफ्तर चला गया था। बेटा स्कूल में था। घर खाली था।

रितु ने चाय बनाई, लेकिन चाय का स्वाद मुंह में नहीं आया। दिमाग में वही नजर घूम रही थी। राजेश कभी इतना देर तक नहीं देखता था।

पहले तो सिर्फ “नमस्ते भाभी” कहकर आगे बढ़ जाता था। आज उसकी आंखों में कुछ और था—जैसे वह जानबूझकर देख रहा हो। दोपहर में जब वह बालकनी में कपड़े सुखाने गई तो गली में फिर राजेश दिखा।

वह अपने घर के सामने खड़ा सिगरेट पी रहा था। रितु के हाथ में साड़ी का पल्लू था। हवा ने पल्लू उड़ा दिया।

राजेश की नजर सीधे उसके ऊपर पड़ी। रितु ने जल्दी से पल्लू संभाला और अंदर चली गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

रात को अनिल घर आया। खाना खाते समय वह ऑफिस की बातें करने लगा। रितु ने हां में हां मिलाई, लेकिन मन कहीं और था।

सोते समय अनिल ने उसकी कमर में हाथ डाला। रितु ने आंखें बंद कर लीं। अनिल का स्पर्श जाना-पहचाना था, लेकिन आज वह स्पर्श फीका लग रहा था।

अनिल जल्दी सो गया। रितु छत की ओर देखती रही। अगले दिन सुबह फिर वही किराने की दुकान।

रितु ने जानबूझकर थोड़ा देर से निकला। राजेश वहां नहीं था। उसे थोड़ी निराशा हुई, फिर खुद पर गुस्सा आया।

“मैं क्या सोच रही हूं? ” उसने अपने आप से कहा। लेकिन तीसरे दिन राजेश फिर मिला।

इस बार वह दुकान के पास ही खड़ा था। “भाभी, अचार वाला तेल मिल गया क्या? ” उसने पूछा।

आवाज सामान्य थी, लेकिन आंखें नहीं। रितु ने सिर हिलाया। “हां… मिल गया।

”राजेश एक कदम करीब आया। “आपके घर के पास वाली गली में नई सब्जी वाली आई है। अच्छा माल लाती है।

” रितु ने सिर्फ मुस्कुराकर जवाब दिया और चल दी। पीछे से राजेश की नजर उसके शरीर पर टिकी रही। रितु को अहसास हो रहा था।

उसकी साड़ी की फिलिंग कमर पर चिपक रही थी, और वह जानती थी कि राजेश देख रहा है। घर आकर उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा। चेहरा अभी भी जवान लग रहा था।

शरीर पर शादी के दस साल का असर जरूर था, लेकिन कमर पतली थी, छातियों का उभार साड़ी के नीचे साफ दिखता था। उसने सोचा—क्या राजेश सच में…? अगले एक हफ्ते तक ये मुलाकातें जारी रहीं।

कभी सब्जी वाली के पास, कभी पार्क के बाहर जहां रितु बेटे को लेने जाती, कभी मंदिर के पास। राजेश हमेशा किसी न किसी बहाने बात करता। बातें मामूली होतीं—मौसम, महंगाई, बच्चों की पढ़ाई।

लेकिन नजरें कुछ और कहतीं। एक शाम रितु छत पर कपड़े सुखाने गई। नीचे गली में राजेश अपने मोटरसाइकिल की मरम्मत कर रहा था।

उसने ऊपर देखा। रितु की साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था। राजेश ने हाथ हिलाया।

रितु ने जवाब में सिर हिलाया। फिर राजेश ने इशारे से बुलाया। रितु का दिल धड़क उठा।

वह नीचे नहीं गई। लेकिन उस रात सोते समय उसके मन में राजेश का चेहरा घूमता रहा। दो दिन बाद अनिल को अचानक ऑफिस से बाहर शहर जाना पड़ा।

तीन दिन की ड्यूटी। बेटा नानी के घर चला गया। घर पूरी तरह खाली हो गया।

पहले दिन रितु ने सामान्य दिन बिताया। दूसरे दिन सुबह जब वह सब्जी लेने निकली तो राजेश गली के कोने पर खड़ा था। “अकेले हैं क्या भाभी?

” उसने पूछा। आवाज में हल्की मुस्कान थी। रितु ने हां कहा।

राजेश ने धीरे से कहा, “चाय पी लूं आपके घर? ”रितु का गला सूख गया। “अभी… घर में कोई नहीं है।

”“इसीलिए तो। ” राजेश की आंखें सीधी उसकी आंखों में घुस गईं। रितु कुछ पल खड़ी रही।

फिर धीरे से सिर हिला दिया। “आ जाइए। ”घर के अंदर राजेश ने दरवाजा बंद किया।

रितु रसोई में चाय बनाने चली गई। हाथ कांप रहे थे। राजेश पीछे-पीछे आया।

उसने रितु की कमर में हाथ रखा। रितु थम गई। “क्या कर रहे हो?

” उसकी आवाज कांप रही थी। राजेश ने उसके बालों को हटाकर गर्दन पर होठ रख दिए। “जो तुम भी चाहती हो।

”रितु ने आंखें बंद कर लीं। विरोध का कोई शब्द मुंह से नहीं निकला। राजेश का हाथ साड़ी के ऊपर से उसकी छाती पर फिसल गया।

उसने धीरे से दबाया। रितु की सांस तेज हो गई। “अनिल…” उसने फुसफुसाया।

“अनिल यहां नहीं है। ” राजेश ने जवाब दिया और साड़ी का पल्लू हटा दिया। उसकी उंगलियां ब्लाउज के हुक पर थीं।

एक-एक करके हुक खोले। रितु की चूचियां बाहर आ गईं। राजेश ने दोनों हाथों से उन्हें थाम लिया और अंगूठे से निप्पल को सहलाया।

रितु की कमर पीछे की ओर मुड़ गई। “नहीं… ऐसा मत करो…” लेकिन उसका शरीर आगे की ओर झुक रहा था। राजेश ने उसे दीवार से सटा दिया।

एक हाथ से चूची दबाते हुए दूसरे हाथ से साड़ी ऊपर की। उसकी उंगलियां जांघ के अंदर तक पहुंच गईं। पैंटी के ऊपर से उसने छूत को दबाया।

रितु की सांस रुक गई। “गीली हो चुकी हो,” राजेश ने फुसफुसाया। रितु शर्म से लाल हो गई, लेकिन विरोध नहीं कर सकी।

राजेश ने पैंटी नीचे सरका दी। उसकी उंगलियां सीधे छूत के अंदर चली गईं। दो उंगलियां अंदर-बाहर होने लगीं।

रितु की टांगें कांपने लगीं। वह राजेश के कंधे पर सिर रखे हुए कराह रही थी। राजेश ने अपना लंड निकाला।

वह सख्त और गर्म था। उसने रितु की एक टांग ऊपर उठाई और लंड को छूत के मुंह पर रखा। धीरे-धीरे धकेल दिया।

रितु की आंखें फट गईं। इतने दिनों बाद किसी और का लंड अंदर जाना… अहसास अलग था। अनिल से ज्यादा मोटा लग रहा था।

राजेश ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के के साथ रितु की चूचियां कांप रही थीं। दीवार से उसकी पीठ रगड़ खा रही थी।

राजेश ने दोनों चूचियों को मुंह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा। रितु के मुंह से आवाजें निकलने लगीं—धीमी, दबी हुई। “जोर से…” उसने खुद ही कहा।

राजेश ने गति बढ़ा दी। लंड पूरी तरह अंदर-बाहर हो रहा था। छूत की दीवारें चिपचिपी हो चुकी थीं।

रितु की टांगें जकड़ने लगीं। वह चरम पर पहुंचने वाली थी। राजेश ने महसूस किया और और तेज कर दिया।

रितु का शरीर अकड़ गया। वह कांपते हुए झड़ गई। राजेश ने भी कुछ देर बाद अपने लंड को बाहर निकाला और रितु की चूचियों पर गिरा दिया।

दोनों कुछ देर तक सांस लेते रहे। रितु की आंखों में आंसू थे—शर्म के, सुख के, और डर के। राजेश ने धीरे से कहा, “अब बार-बार मिलना होगा।

”रितु ने कुछ नहीं कहा। उसने कपड़े ठीक किए और राजेश को बाहर भेज दिया। उस रात रितु अकेली बिस्तर पर लेटी रही।

शरीर में अभी भी राजेश का स्पर्श महसूस हो रहा था। छूत हल्का-हल्का दुख रहा था। मन में अनिल का चेहरा आ रहा था।

दोष की भावना भारी थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी भूख भी थी। अगले दिन राजेश फिर आया। इस बार रितु ने खुद दरवाजा खोला।

दोनों बिना बात किए बेडरूम में चले गए। राजेश ने रितु को बिस्तर पर लिटाया। साड़ी पूरी उतार दी।

नंगी रितु को देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। उसने जांघों को फैलाया और छूत को जीभ से चाटना शुरू किया। रितु की कमर उठ गई।

राजेश की जीभ अंदर तक जा रही थी। वह जहांत को भी चूम रहा था। फिर उसने रितु को घुटनों के बल किया।

पीछे से लंड अंदर डाल दिया। इस बार धक्के और तेज थे। रितु का सर तकिए में धंसा हुआ था।

हर धक्के के साथ उसकी चूचियां बिस्तर से टकरा रही थीं। राजेश ने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा। रितु चीख गई, लेकिन दर्द के साथ मजा भी आ रहा था।

राजेश ने लंड निकालकर रितु के मुंह के पास लाया। “चूसो। ” रितु ने हिचकिचाते हुए लंड को मुंह में लिया।

स्वाद अलग था। उसने जितना हो सके उतना अंदर लिया। राजेश उसके बाल पकड़कर धक्के लगाने लगा।

फिर उसने फिर से छूत में डाल दिया और अंत में रितु के मुंह में ही झड़ गया। तीसरे दिन अनिल आने वाला था। राजेश सुबह आया।

दोनों ने जल्दी-जल्दी संबंध बनाए। रितु ने खुद अपनी टांगें फैलाईं। राजेश के लंड को अपने हाथ से पकड़कर छूत में डाल लिया।

इस बार वह खुद ऊपर बैठी और हिप्स हिलाकर मजा लेने लगी। चूचियां राजेश के मुंह में थीं। वह काट-काट कर चूस रहा था।

जब राजेश जाने लगा तो रितु ने कहा, “अब मत आना। अनिल आ जाएगा। ”राजेश मुस्कुराया।

“मैं दूरी बनाए रखूंगा। लेकिन जब मौका मिलेगा…”अनिल घर आया। सामान्य जीवन शुरू हो गया।

लेकिन रितु का मन बदल चुका था। जब अनिल रात को उसके पास आता तो वह आंखें बंद कर राजेश को याद करती। अनिल का लंड अब छोटा और कमजोर लगता।

कई बार वह खुद को रोक नहीं पाती और दिन में राजेश से मिलने का कोई बहाना बना लेती। एक दोपहर जब अनिल ऑफिस में था, राजेश फिर आया। दोनों ने बाथरूम में संबंध बनाए।

पानी की बौछार के नीचे राजेश ने रितु को दीवार से सटाकर पीछे से लिया। पानी और पसीने से शरीर चिकना हो रहा था। राजेश के हाथ उसकी चूचियों को जोर-जोर से मसल रहे थे।

रितु की आवाजें बाथरूम में गूंज रही थीं। समय बीतता गया। रितु और राजेश की मुलाकातें छिप-छिप कर जारी रहीं।

कभी पार्क के कोने में, कभी खाली मकान में, कभी रितु के घर में जब कोई नहीं होता। हर बार संबंध और गहरे होते गए। राजेश ने उसे अलग-अलग अंदाज सिखाए।

कभी रितु को घोड़ी बनाकर, कभी उसे गोद में उठाकर, कभी उसकी गांड में उंगली डालकर। एक दिन राजेश ने कहा, “तुम्हारी गांड भी लेनी है। ”रितु डर गई, लेकिन मना नहीं कर सकी।

राजेश ने धीरे-धीरे तैयारी की। तेल लगाकर पहले उंगली, फिर लंड। दर्द बहुत था, लेकिन धीरे-धीरे मजा आने लगा।

रितु का शरीर कांप रहा था। राजेश पूरे जोर से धक्के लगा रहा था। अंत में दोनों एक साथ झड़ गए।

लेकिन सुख के साथ डर भी बढ़ रहा था। एक दिन अनिल ने रितु के फोन में राजेश का मैसेज देख लिया। मैसेज साफ था—“कल दोपहर आ जाऊंगा।

तैयार रहना। ”अनिल ने कुछ नहीं कहा। रात को उसने रितु से सीधे पूछा।

रितु से झूठ नहीं बोला गया। उसने सब बता दिया। आंसू बह रहे थे।

अनिल चुप रहा। फिर बोला, “मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता। लेकिन ये बंद होना चाहिए।

”रितु ने सिर हिलाया। लेकिन मन में राजेश की भूख बाकी थी। कुछ दिनों तक सब शांत रहा।

फिर एक दिन राजेश ने गली में रोक लिया। “मिलना बंद कर दिया? ”रितु ने आंसुओं भरी आंखों से कहा, “अनिल को पता चल गया।

”राजेश ने उसकी कलाई पकड़ ली। “तो क्या? मैं अभी भी तुम्हें चाहता हूं।

”उस रात रितु ने अनिल के सो जाने के बाद चुपके से घर से निकली। राजेश के घर के पीछे वाली कोठरी में दोनों मिले। वहां अंधेरा था।

कपड़े जल्दी-जल्दी उतरे। राजेश ने रितु को फर्श पर लिटाया और जोर-जोर से लिया। इस बार और भी बेकाबू होकर।

रितु की चीखें दबी हुई थीं। छूत सूज चुका था, लेकिन वह रोक नहीं पा रही थी। सुबह घर लौटते समय रितु के मन में सिर्फ एक बात थी—ये खेल अब बहुत खतरनाक हो चुका है।

लेकिन शरीर की भूख और राजेश की नजरें उसे बार-बार खींच रही थीं। शहर छोटा था। बातें फैलने में देर नहीं लगती।

एक दिन पड़ोस की औरत ने हल्के से पूछा, “राजेश भैया अक्सर तुम्हारे घर के आसपास क्यों घूमते रहते हैं? ”रितु का चेहरा पीला पड़ गया। उसने टाल दिया।

लेकिन डर बैठ गया। फिर भी जब राजेश ने फिर बुलाया तो वह गई। इस बार दोनों ने पुराने मकान की छत पर संबंध बनाए।

रात का अंधेरा था। राजेश ने रितु की साड़ी फाड़ दी। नंगी रितु को छत की दीवार से सटाकर खड़ा कर लिया।

लंड अंदर डालते हुए उसने कहा, “तुम मेरी हो गई हो। ”रितु सिर्फ कराह रही थी। हर धक्के के साथ उसका शरीर कांप रहा था।

चूचियां हवा में कांप रही थीं। राजेश ने उसकी गांड में भी लंड डाल दिया। दर्द और सुख का मिश्रण रितु को पागल कर रहा था।

वापस घर आकर उसने आईने में खुद को देखा। गर्दन पर काटने के निशान थे। जांघों पर नील।

छूत अभी भी गीला था। उसने कपड़े बदलकर अनिल के पास लेट गई। अनिल सोया हुआ था।

रितु ने आंखें बंद कीं। मन में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था—ये कब तक चलेगा? और जब खत्म होगा तो क्या बचेगा?

कुछ हफ्ते और बीते। रितु और राजेश की मुलाकातें जारी रहीं। हर बार जोखिम बढ़ रहा था।

एक दिन बेटा स्कूल से जल्दी आ गया और दोनों को लगभग पकड़ ही लिया। रितु ने किसी तरह संभाला। उस रात रितु ने फैसला किया।

अगली मुलाकात में उसने राजेश से कहा, “बस… अब और नहीं। ”राजेश ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। “तुम बिना मेरे नहीं रह सकती।

”रितु रो पड़ी। “मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। ”राजेश ने उसे कसकर पकड़ लिया।

फिर धीरे से कपड़े उतरने लगे। रितु विरोध नहीं कर सकी। आखिरी बार दोनों ने घंटों तक एक-दूसरे को लिया।

हर अंदाज में, हर जगह। रितु की चूचियां, छूत, गांड—सब कुछ राजेश के कब्जे में था। अंत में दोनों थककर लेट गए।

सुबह रितु घर लौटी। अनिल ऑफिस जा चुका था। उसने नहाया, कपड़े बदले और खिड़की के पास खड़ी हो गई।

गली में राजेश नहीं था। शायद वह भी समझ गया था। लेकिन शाम को जब रितु बालकनी में खड़ी थी तो गली के मोड़ पर राजेश फिर दिखाई दिया।

उसने दूर से देखा। रितु ने पर्दा नहीं खींचा। दोनों की नजरें मिलीं।

कुछ पल तक। फिर राजेश मुस्कुराया और चला गया। रितु अंदर आई।

दिल की धड़कन तेज थी। शरीर में फिर वही भूख जाग चुकी थी। शादी, विश्वास, डर—सब कुछ एक तरफ था।

और दूसरी तरफ वो खामोश चाहत जो अब छुप नहीं रही थी। रात को अनिल के पास लेटे हुए रितु ने आंखें बंद कीं। मन में राजेश का लंड, उसकी उंगलियां, उसकी जीभ—सब घूम रहा था।

उसने अनिल का हाथ अपनी छाती पर रखा। लेकिन दिमाग कहीं और था। छोटे शहर की ये खामोश रातें अब पहले जैसी नहीं थीं।

एक शादीशुदा औरत के मन में जो बीज पड़ चुका था, वह धीरे-धीरे फलने लगा था। और कोई नहीं जानता था कि आगे क्या होने वाला है।

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