गर्मी इस साल इतनी तेज थी कि दोपहर में पेड़ की छाँव भी राहत नहीं दे रही थी। बस से उतरते ही अंजलि ने माथे का पसीना पोंछा। पति सुरेश सामान उतार रहा था।
दोनों गाँव के किनारे वाले पुराने मकान के सामने खड़े थे। मकान सालों से ताला लगा था। सुरेश के दादा का था।
परिवार शहर चला गया था। अब नौकरी की वजह से सुरेश को पास के कस्बे में रहना पड़ रहा था। घर खाली पड़ा देखकर फैसला किया कि पत्नी के साथ यहीं रहेंगे।
ताला खोला तो अंदर घुटन भरी हवा निकली। धूल की परत चढ़ी हुई थी। अंजलि ने खिड़कियाँ खोलीं।
“यह घर कितने साल से बंद था? ” उसने पूछा। “बारह-तेरह साल,” सुरेश ने जवाब दिया।
“दादा के बाद कोई नहीं आया। ”पड़ोसी हरिराम खबर पाते ही आ गए। उम्र साठ के पार।
शरीर दुबला लेकिन मजबूत। गाँव में इज्जत की नजर से देखे जाते थे। “सुरेश बेटा, तुम आ गए।
अच्छा किया। यह घर यूँ ही पड़ा रहता तो और गिर जाता,” हरिराम ने कहा। उन्होंने कुएँ का पानी चखने को कहा, सिंचाई की नाली समझाई, गाँव के रीति-रिवाज बताए।
अंजलि को राहत मिली। अकेली नई जगह पर कोई अपना सा लग रहा था। सुरेश सुबह जल्दी कस्बे चला जाता।
शाम को लौटता। दिन में अंजलि घर सँभालती। हरिराम कभी-कभी आ जाते।
खेत का हाल बताते, गाँव की छोटी-मोटी बातें करते। गर्मी बढ़ती जा रही थी। रात को भी हवा नहीं चलती थी।
पहली रात सुरेश के लौटने पर दोनों थककर बिस्तर पर लेटे। गर्मी से शरीर चिपक रहे थे। सुरेश ने अंजलि को करीब खींचा।
उसके होंठ अंजलि के होंठों पर आ गए। चुंबन गहरा होता गया। सुरेश का हाथ उसकी चूचियों पर फिसल गया।
ब्लाउज के ऊपर से दबाया। अंजलि की साँस तेज हो गई। सुरेश ने ब्लाउज के हुक खोले।
बड़ी-बड़ी गोल चूचियाँ बाहर छलांग लगाकर आ गईं। भारी और मुलायम। लंबे-मोटे निप्पल पूरी तरह खड़े हो चुके थे, काले और सख्त।
सुरेश ने दोनों बड़ी चूचियों को हाथों में भर लिया और जोर से मसलने लगा। फिर लंबे निप्पल को मुँह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्का काटा।
अंजलि की कराह निकल गई। “आह… सुरेश… जोर से चूसो…”खिड़की के बाहर अंधेरे में हरिराम खड़े थे। वे घर के आसपास पहरा देने आए थे।
अचानक उनकी नजर अंदर पड़ी। अंजलि की बड़ी-बड़ी चूचियाँ और लंबे खड़े निप्पल साफ दिख रहे थे। सुरेश उन्हें मसल रहा था, चूस रहा था।
हरिराम की साँस रुक गई। पचास साल की उम्र के बाद उनका लंड कभी सख्त नहीं होता था। लेकिन आज अंजलि की उन भारी चूचियों और लंबे निप्पलों को देखकर उनका लंड अचानक जोर से तन गया।
इतना सख्त कि धोती में दर्द होने लगा। वे वहीं खड़े देखते रहे। अंजलि की चूचियाँ हिल रही थीं।
निप्पल सुरेश के मुँह में जा रहे थे। हरिराम का हाथ खुद उनकी धोती पर चला गया। वे लंड सहलाते हुए देखते रहे।
अंदर सुरेश ने साड़ी ऊपर की। पैंटी खींच दी। उँगलियाँ चूत में डाल दीं।
अंजलि गीली हो चुकी थी। सुरेश ने अपना लंड निकाला और धीरे-धीरे अंदर धकेला। अंजलि की आँखें बंद हो गईं।
“पूरा डालो…” सुरेश पूरा अंदर तक चला गया। धक्के लगाने लगा। पुराने बिस्तर की चरमराहट गूंज रही थी।
हर धक्के के साथ अंजलि की बड़ी चूचियाँ जोर-जोर से हिल रही थीं। लंबे निप्पल हवा में काँप रहे थे। सुरेश ने उन्हें फिर मुँह में ले लिया और चूसते हुए जोर-जोर से चोदा।
अंजलि काँपते हुए झड़ गई। सुरेश ने भी उसके अंदर छोड़ दिया। दोनों पसीने से भीगे लेटे रहे।
बाहर हरिराम अभी भी खड़े थे। उनका लंड पूरी तरह सख्त था। इतने सालों बाद पहली बार।
अंजलि की बड़ी चूचियों का नजारा उनके दिमाग में घूम रहा था। वे चुपचाप लौट गए लेकिन मन में एक नई आग जल चुकी थी। अगले दिनों हरिराम अंजलि के पास आने के बहाने बढ़ाने लगे।
सुरेश कस्बे गया होता तो वे आँगन में बैठकर बातें करते। नजरें अंजलि की साड़ी के उभार पर चली जातीं। एक दिन उन्होंने धीरे से कहा, “तुम्हारी चूचियाँ… बहुत सुंदर हैं।
मैंने कल रात… देख ली थीं। ”अंजलि का चेहरा लाल हो गया। “आप…?
”हरिराम ने पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया। “पचास के बाद मेरा लंड कभी नहीं उठता था। लेकिन तुम्हारी बड़ी-बड़ी चूचियाँ और लंबे निप्पल देखकर तन गया।
अब शांत नहीं हो रहा। ”अंजलि पीछे हटी लेकिन हरिराम ने उसे दीवार से सटा दिया। “एक बार छू लेने दो।
” अंजलि विरोध करना चाहती थी लेकिन हरिराम के हाथ ब्लाउज के अंदर घुस गए। उन्होंने बड़ी-बड़ी चूचियों को जोर से मसला। लंबे निप्पल को उँगलियों में लेकर मरोड़ा।
अंजलि की कराह निकल गई। हरिराम ने ब्लाउज नीचे किया और लंबे निप्पल को मुँह में ले लिया। जोर-जोर से चूसने लगे।
दाँतों से काटा। अंजलि की टाँगें काँपने लगीं। “नहीं… हरिराम… सुरेश…”लेकिन हरिराम नहीं रुके।
उन्होंने अंजलि को बिस्तर पर लिटा दिया। साड़ी और पैंटी उतार दी। चूत को चाटा।
फिर अपना लंड निकाला। सुरेश से भी मोटा और लंबा। अंजलि की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“इतना… बड़ा…” हरिराम ने मोटे लंड का सिरा चूत पर रखा और एक झटके में आधा अंदर धकेल दिया। अंजलि चीख पड़ी। “आह… बहुत मोटा… फाड़ रहा है…” हरिराम ने पूरा अंदर कर दिया।
फिर जोर-जोर से धक्के लगाने लगे। हर धक्के के साथ अंजलि की बड़ी चूचियाँ उछल रही थीं। हरिराम लंबे निप्पल को मुँह में ले लेकर चूसते रहते।
अंजलि की चूत पूरी तरह फैल चुकी थी। हरिराम ने अंजलि को घुटनों के बल किया। गांड के गाल फैलाए।
जीभ से छेद को जोर से चाटा। थूक डाला। फिर मोटा लंड गांड में धीरे-धीरे धकेला।
अंजलि चीख रही थी। “आह… गांड फट रही है… इतना बड़ा लंड…” हरिराम ने पूरा अंदर कर दिया और पागलों की तरह धक्के लगाने लगे। अंजलि की बड़ी चूचियाँ बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं।
लंबे निप्पल मिट्टी में दब रहे थे। हरिराम ने उसकी गांड इतनी जोर से चोदी कि अंजलि बार-बार झड़ने लगी। आखिर में हरिराम ने गांड की गहराई में ही सब छोड़ दिया।
इतना कि पानी बाहर बहने लगा। उसके बाद हरिराम नियमित आने लगे। सुरेश के गैर मौजूदगी में अंजलि को चोदते।
बड़ी-बड़ी चूचियों को घंटों चूसते। लंबे निप्पल को काट-काट कर लाल कर देते। चूत और गांड दोनों में अपना मोटा लंड डालते।
अंजलि पहले हिचकिचाती लेकिन शरीर मान जाता। हरिराम का लंड सुरेश से बड़ा था। गहराई तक जाता।
अंजलि कराहती, “और अंदर… पूरी तरह फाड़ दो…”तीसरे दिन रात को अंजलि अकेली थी। अचानक आँगन में कुछ गिरने की आवाज आई। उसने लालटेन जलाई और बाहर देखी।
कोई नहीं था। सिर्फ पुराना टूटा घड़ा पड़ा था। सुबह हरिराम को बताया।
हरिराम ने घड़ा उठाया। “शायद बिल्ली या लोमड़ी हो। पुराने घरों में ऐसे होता रहता है।
” लेकिन बात करते-करते उन्होंने अंजलि की चूचियाँ फिर मसल दीं। लंबे निप्पल चूसे। फिर वहीं आँगन में अंजलि को घोड़ी बनाकर गांड में मोटा लंड डाल दिया।
अंजलि की चीखें दबी हुई थीं। आवाजें रुकीं नहीं। अगली रात छत पर कदमों जैसी आवाज आई।
अंजलि ने सुरेश को जगाया। दोनों ऊपर गए। कोई नहीं मिला।
डर के मारे अंजलि सुरेश से लिपट गई। सुरेश ने उसे चोदा लेकिन अंजलि के मन में हरिराम का मोटा लंड घूम रहा था। हरिराम को फिर बताया गया।
उन्होंने गंभीर होकर कहा, “इस घर के साथ कुछ पुरानी बातें जुड़ी हैं। ” फिर रात को अकेले में अंजलि को फिर चोदा। बड़ी चूचियाँ चूसते हुए, लंबे निप्पल काटते हुए, गांड चाटते हुए और मोटे लंड से चूत और गांड दोनों फाड़ते हुए।
पाँचवीं रात को कुएँ से पानी की आवाज आई। अंजलि ने देखा। छाया दिखी।
हरिराम आए। तीनों ने जाँच की। पदचिह्न थे।
हरिराम ने विवाद का राज़ बताया। रामप्रसाद का लापता होना, जमीन का झगड़ा, चिट्ठी और डिब्बा। सच सामने आया।
सुमित्रा आई। माफी मांगी। शांति हुई।
लेकिन रात को जब सब शांत हो गया तो हरिराम फिर आए। अंजलि दरवाजा खोलते ही उनके गले लग गई। “आज और जोर से… अपनी बड़ी चूचियाँ चूसने दो… मोटा लंड गांड में डालो…” हरिराम ने बड़ी-बड़ी चूचियों को मुट्ठी में भरकर मसला।
लंबे-मोटे निप्पल को मुँह में ले लेकर जोर से चूसा। काटा। फिर अंजलि को बिस्तर पर लिटाया।
चूत चाटी। मोटा लंड चूत में पूरा अंदर तक डालकर जोर-जोर से चोदा। अंजलि की चूचियाँ उछल रही थीं।
फिर उसे घुटनों के बल किया। गांड चाटी। जीभ अंदर तक डाली।
फिर मोटा लंड गांड में एक झटके में धकेल दिया। अंजलि चीख पड़ी। “आह… सुरेश से भी बड़ा… गांड फाड़ रहा है…” हरिराम ने देर तक दोनों जगह बारी-बारी चोदा।
बड़ी चूचियाँ मसलते रहे। लंबे निप्पल चूसते रहे। आखिर में गांड की गहराई में ही सब छोड़ दिया।
पुराने घर ने अपना राज़ खोल दिया था। जमीन का विवाद खत्म हो गया था। लेकिन अंजलि और हरिराम के बीच एक नया राज़ शुरू हो चुका था।
बड़ी-बड़ी चूचियाँ, लंबे खड़े निप्पल और हरिराम का मोटा लंड अब उस घर की नई कहानी बन चुके थे। सुरेश कस्बे जाता तो हरिराम आते। अंजलि की चूचियाँ चूसते।
गांड चाटते। मोटे लंड से अंदर तक चोदते। अंजलि कराहती रहती।
गाँव के किनारे खड़ा वह पुराना घर अब सिर्फ ईंट-पत्थर का नहीं रह गया था। वह एक कहानी बन चुका था—गलतफहमी, शक, डर, सच और साथ में वो जंगली शारीरिक भूख जो रातों की अजीब आवाजों के बीच और भी गहरी हो गई थी।