उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में, जहाँ कच्चे मकान, हरियाली खेत और पुराने तालाब थे, वहाँ रहती थी रमीला। उम्र पच्चीस साल। गोरी-चिट्टी, लंबी, भरपूर शरीर।
बड़ी-बड़ी गोल चुचियाँ, जिनके लंबे काले निप्पल हमेशा साड़ी के पार से झलकते। पतली कमर और भारी, मुलायम गाँड जो चलते समय हिलती-डुलती रहती। पति रामू शहर में मजदूरी करने गया हुआ था।
महीनों से घर नहीं लौटा। ससुराल वाले खेतों में काम करते, और रमीला अकेली अपनी झोपड़ी में दिन काटती। गाँव में ही रहता था बबलू।
बाईस साल का जवान लड़का। मजबूत शरीर, कंधे चौड़े, और जाँघों के बीच लटकता मोटा, लंबा लंड—पूरे नौ इंच का। खेतों में काम करता, लेकिन रात को अक्सर तालाब के किनारे या पुराने आम के पेड़ के नीचे अकेला बैठा अपनी हवस बुझाता।
रमीला को वो बहुत दिनों से देख रहा था। जब वो खेत से पानी लेकर लौटती, साड़ी भीग जाती, चुचियाँ साफ़ झलकतीं, तो बबलू का लंड तन जाता। एक दोपहर की बात है।
धूप तेज़ थी। रमीला तालाब पर नहाने गई थी। साड़ी और ब्लाउज किनारे रखकर पानी में उतर गई।
पानी छाती तक था। चुचियाँ पानी पर तैर रही थीं। बबलू पेड़ के पीछे से देख रहा था।
लंड पहले से ही सख्त। उसने हिम्मत की और पानी में उतर गया। रमीला ने पीछे मुड़कर देखा।
डर के मारे साँस अटक गई, लेकिन बबलू के शरीर और जाँघों के बीच तने लंड को देखकर उसकी चूत में गर्मी दौड़ गई। महीनों से पति का लंड नहीं छुआ था। बबलू पास आया।
पानी में दोनों खड़े थे। “रमीला भाभी… तुम्हारी चुचियाँ देख-देख के मेरा लंड पागल हो रहा है। आज तो चोदूंगा।
” रमीला ने हल्के से विरोध किया, लेकिन आवाज़ में मना नहीं था। “बबलू… कोई देख लेगा… मत कर…” बबलू ने आगे बढ़कर उसकी दोनों बड़ी चुचियाँ हाथों में भर लीं। निप्पल को उंगलियों से मसल दिया।
रमीला की कमर लचक गई। बबलू ने मुँह लगाकर एक निप्पल चूस लिया, दाँतों से हल्का काटा। रमीला की चीख पानी में दब गई।
“आह्ह… चुस… जोर से चुस मेरी चुचियाँ…” बबलू ने दोनों चुचियों को बारी-बारी चूसा, चाटा, काटा। फिर हाथ नीचे ले जाकर रमीला की चूत पर रख दिया। बालों वाली, गरम, गीली चूत।
दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। रमीला ने बबलू का कंधा पकड़ लिया। “मेरी चूत में उंगली मत डाल… अह्ह… डाल… और अंदर…” बबलू ने रमीला को तालाब के किनारे ले जाकर लेटा दिया।
साड़ी बिछाई। खुद उसके ऊपर चढ़ गया। लंड चूत के मुँह पर रख दिया।
एक जोरदार धक्का। पूरा नौ इंच अंदर धँस गया। रमीला की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“आह्ह्ह्ह… मेरी चूत फट गई… इतना मोटा लंड… रामू का तो आधा भी नहीं था… चोद… जोर से चोद…” बबलू ने कमर चलानी शुरू की। थपथप-थपथप। हर धक्के के साथ रमीला की बड़ी गाँड जमीन पर रगड़ खा रही थी।
चुचियाँ हवा में हिल रही थीं। बबलू ने उन्हें मुँह में ले लिया और चूसते हुए चोदता रहा। रमीला की टाँगें उसकी कमर पर लिपट गईं।
“और तेज़… मेरी चूत फाड़ दे… आज तो पूरी तरह चोद ले…” बबलू ने रमीला को पलटा। घुटनों के बल कर दिया। गाँड ऊपर।
बड़ी, गोल, गोरी गाँड। बबलू ने दोनों गाल फैलाए और जीभ निकालकर गाँड के छेद पर लपका दी। चाटने लगा।
जीभ अंदर-बाहर। रमीला पागल हो गई। “आह्ह… मेरी गाँड चाट… जीभ डाल… फिर लंड डाल देना…” बबलू ने काफी देर गाँड चाटी, थूक लगाया, फिर लंड का सिरा गांड पर रखा।
धीरे से धक्का दिया। सिरा घुसा। रमीला चिल्लाई।
बबलू ने कमर जोर से मारी। पूरा लंड गांड में चला गया। “फाट गई… मेरी गाँड फट गई… बबलू… जोर से चोद… बैठने लायक मत छोड़…” बबलू ने थप्पड़ मारना शुरू किया।
छपाक-छपाक। गाँड लाल होने लगी। कमर पूरी ताकत से चला रहा था।
लंड पूरा निकलता, फिर पूरा धँसता। रमीला के मुँह से केवल कराह और गालियाँ निकल रही थीं। “चोद साले… मेरी गाँड चोद… मेरी चूत भी चोद… दोनों फाड़ दे…” बबलू ने लंड निकाला और फिर चूत में डाल दिया।
कुछ देर चूत चोदी, फिर वापस गांड में। दोनों छेद बारी-बारी इस्तेमाल कर रहा था। रमीला की चूत और गांड दोनों से पानी और लार बह रही थी।
बबलू ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और तेज़ चोदने लगा। अंत में बबलू ने गांड की गहराई में जाकर जोर से झड़ दिया। गर्म वीर्य की धारें रमीला की गाँड में फूट पड़ीं।
रमीला खुद भी काँपते हुए झड़ गई। दोनों तालाब के किनारे पड़े रहे। शाम को बबलू फिर रमीला की झोपड़ी पर पहुँच गया।
दरवाजा बंद होते ही दोनों नंगे हो गए। रमीला ने बबलू का लंड हाथ में लिया, मुँह में डाल लिया। गले तक चूसा।
गैगिंग की आवाज़ आने लगी। टट्टे मुँह में ले लिए, चाटे, चूसे। फिर खुद बिस्तर पर लेट गई, टाँगें फैला दीं।
“आज रात भर चोद… मेरी चूत, मेरी गाँड, मेरा मुँह… सब जगह अपना लंड डाल…” बबलू ने पूरी रात वैसा ही किया। कभी मिशनरी में चूत चोदी, कभी डॉगी में गाँड फाड़ी, कभी रमीला को ऊपर बिठाकर चुचियाँ चूसते हुए नीचे से धक्के मारे। रमीला की चुचियाँ उसके मुँह में थीं, निप्पल दाँतों के बीच।
गाँड उसके हाथों में दब रही थी। चूत लंड निगल रही थी। सुबह तक रमीला की गाँड इतनी सूज गई थी कि वो बैठ नहीं पा रही थी।
चलते समय टाँगें फैलानी पड़ रही थीं। लेकिन आँखों में संतोष था। बबलू जब जाने लगा तो रमीला ने उसका लंड फिर से मुँह में लिया, साफ़ किया और बोली— “ये लंड अब मेरा है।
जब चाहे आ जाना। मेरी चूत और गाँड दोनों तेरे लिए तैयार रहेंगी। ” गाँव की उस झोपड़ी में उसके बाद कई रातें ऐसी बीतीं।
खेतों के बीच, तालाब के किनारे, अंधेरी रातों में—बबलू का मोटा लंड रमीला की चूत और गाँड को बार-बार फाड़ता रहा। चुचियाँ चूसी जातीं, गाँड चाटी जाती, और चोदाई इतनी जोर की होती कि सुबह रमीला चल भी नहीं पाती। और गाँव सोता रहता… जबकि झोपड़ी के अंदर सिर्फ गीली आवाजें गूँजतीं—लंड की, चूत की, गाँड की।
उस रात बारिश पड़ रही थी। गाँव के कच्चे रास्ते कीचड़ हो गए थे। बबलू की झोपड़ी से रमीला की झोपड़ी तक का फासला छोटा था, लेकिन वो भीगते-भीगते पहुँचा।
दरवाज़ा खटखटाया। रमीला अंदर दीया जलाए बैठी थी। साड़ी गीली थी, चुचियाँ साफ़ झलक रही थीं।
दरवाज़ा खुलते ही बबलू अंदर घुस गया और किवाड़ बंद कर दिया। रमीला ने कुछ कहा नहीं। बस साड़ी का पल्लू गिरा दिया।
बड़ी-बड़ी गोल चुचियाँ बाहर आ गईं। लंबे काले निप्पल पहले से सख्त। बबलू ने आगे बढ़कर दोनों चुचियाँ हाथों में भर लीं और जोर से मसल दीं।
रमीला की साँस तेज़ हो गई। “आज तो मेरी चूत और गाँड दोनों चोदना… इतनी जोर से कि सुबह उठ भी न पाऊँ। ” बबलू ने उसे चारपाई पर धकेल दिया।
खुद नंगा हो गया। नौ इंच का मोटा लंड तनकर खड़ा था। रमीला ने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया, मुँह के पास ले गई और जीभ से चाटने लगी।
पहले टट्टे मुँह में लिए, एक-एक करके चूसे, फिर लंड को गले तक धकेल दिया। घर्र-घर्र की आवाज़ आने लगी। आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन रमीला रुकी नहीं।
लार ठोड़ी से नीचे टपक रही थी। बबलू ने बाल पकड़कर उसका सिर और जोर से लंड पर ठोकना शुरू किया। “चुस… पूरे लंड को निगल… गला भर जाए।
” रमीला गैगिंग कर रही थी, लेकिन मज़े से। जब लंड पूरी तरह लार से नहा चुका, तब बबलू ने उसे घुटनों के बल कर दिया। गाँड ऊपर उठाई।
बड़ी, गोरी, मुलायम गाँड। बबलू ने दोनों गाल फैलाए और जीभ सीधे गांड के छेद पर लपका दी। जोर-जोर से चाटने लगा।
जीभ अंदर घुसाई, घुमाई, निकाली। रमीला की कमर काँप रही थी। “आह्ह्ह… चाट साले… मेरी गाँड को गीला कर दे… फिर लंड डाल…” बबलू ने काफी देर तक गाँड चाटी।
थूक की लार गांड से नीचे चूत तक बह रही थी। फिर उसने लंड का मोटा सिरा गांड पर रखा और एक लंबा धक्का मारा। आधा लंड अंदर चला गया।
रमीला चिल्लाई। “आह्ह्ह… दर्द हो रहा… लेकिन मत निकाल… और अंदर डाल…” बबलू ने कमर और जोर से मारी। पूरा नौ इंच गांड में धँस गया।
रमीला की चीख चारपाई के नीचे दब गई। बबलू ने थप्पड़ मारना शुरू किया—छपाक! छपाक!
गाँड लाल होने लगी। हर धक्के के साथ गाँड हिल रही थी, चुचियाँ चारपाई पर रगड़ खा रही थीं। “जोर से चोद… मेरी गाँड फाड़ दे… बैठने लायक मत छोड़…” बबलू ने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और पूरी ताकत से चोदने लगा।
थपथप-थपथप की आवाज़ बारिश की आवाज़ से भी तेज़ थी। कभी पूरा लंड निकालता, फिर एक झटके में पूरा धँसा देता। रमीला की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वो कमर पीछे की तरफ ही धकेल रही थी।
थोड़ी देर बाद बबलू ने लंड निकाला और सीधा चूत में डाल दिया। चूत पहले से इतनी गीली थी कि लंड आसानी से अंदर चला गया। अब वो बारी-बारी चोद रहा था—कभी चूत, कभी गाँड।
दोनों छेद लंड की मार से फूल गए थे। रमीला की चूत से पानी की धार बह रही थी। “आह्ह… दोनों फाड़ दे… मेरी चूत भी, गाँड भी… आज तो पूरी तरह अपनी रंडी बना ले…” बबलू ने रमीला को पलटा।
मिशनरी पोजीशन। टाँगें उसके कंधों पर रख दीं। लंड फिर गांड में धँसाया और जोर-जोर से धक्के मारने लगा।
एक हाथ से उसकी बड़ी चुचियाँ मसल रहा था, निप्पल को उंगलियों से मरोड़ रहा था। रमीला पागल हो रही थी। अंत में बबलू ने गांड की सबसे गहराई में जाकर जोर से झड़ दिया।
गर्म वीर्य की कई धारें रमीला की गाँड में फूट पड़ीं। रमीला खुद भी काँपते हुए झड़ गई। चूत से पानी छलक गया।
दोनों पसीने और बारिश के पानी से भीगे पड़े रहे। थोड़ी देर बाद रमीला ने धीरे से कहा— “निकाल मत… अंदर ही रहने दे… मुझे तेरा लंड गाँड में महसूस होता रहे…” बबलू मुस्कुराया और फिर से कमर हिलाने लगा। इस बार धीरे, लेकिन गहरा।
बाहर बारिश हो रही थी… और अंदर सिर्फ गीली चोदाई की आवाज़ें। बबलू ने रमीला की गांड में लंड गहराई तक धँसाए रखा। दोनों बारिश की आवाज़ के बीच लेटे रहे।
रमीला की गांड पूरी तरह लाल और सूजी हुई थी, उसमें से बबलू का गर्म वीर्य धीरे-धीरे रिस रहा था। थोड़ी देर बाद बबलू ने धीरे से लंड निकाला। रमीला कराह उठी।
उसने बबलू का लंड हाथ में लिया, मुँह के पास ले जाकर चाटने लगी। सारा वीर्य और गांड की गंदगी साफ कर दी। “अब ये लंड सिर्फ़ मेरा है,” रमीला ने थकी हुई आवाज़ में कहा।
“जब चाहे आ जाना। चाहे दोपहर हो या रात। मेरी चूत और गांड दोनों तेरे लिए हमेशा तैयार रहेंगी।
”बबलू ने उसके बड़े चूचों को दबाते हुए चुंबन लिया। “मैं रोज़ आऊँगा भाभी। तेरी इस दूधिया गांड को रोज़ लाल करता रहूँगा।
”उस रात के बाद गाँव में कई रातें ऐसी बीतीं। कभी तालाब के किनारे, कभी खेत की मेड़ पर, कभी रमीला की अंधेरी झोपड़ी में—बबलू का नौ इंच का मोटा लंड रमीला की चूत और गांड को बार-बार फाड़ता रहा। सुबह जब रमीला खेत की तरफ चलती तो टाँगें फैलाकर चलती, क्योंकि गांड अभी भी दर्द कर रही होती।
गाँव वाले सोते रहते… और झोपड़ी के अंदर सिर्फ़ गीली आवाज़ें गूँजतीं—लंड की, चूत की, और लाल गांड की। रमीला अब अकेली नहीं थी। उसका शरीर बबलू का हो चुका था।
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