इस makan malik ki beti Hindi adult story की शुरुआत एक नए शहर के पुराने मकान की ऊपरी मंज़िल से होती है, जहाँ अमित और नेहा किराए पर रहने आए थे। नए शहर की गलियाँ अमित को अभी भी अजनबी लगती थीं। ऑफिस का काम जल्दी खत्म नहीं होता था।
घर लौटते समय थकान चेहरे पर चढ़ी रहती। नेहा ऊपर वाली मंजिल की रेलिंग से झाँकती रहती। दोनों ने पुराने मकान की ऊपरी मंजिल किराए पर ली थी।
नीचे मकान मालिक का परिवार रहता। पिता ज्यादातर बाहर रहते। माँ बीमार।
सारा घर पूजा सँभालती। उम्र अट्ठाईस साल। अविवाहित।
चेहरा साफ। आँखों में एक तरह की परिपक्वता। पहले हफ्ते सिर्फ नमस्ते होती।
पूजा दूध या सब्जी का हिसाब देने आती। नेहा दरवाजा खोलती। दोनों मुस्कुरा देतीं।
फिर एक दिन नेहा की रसोई में गैस कम पड़ गई। पूजा ने अपना सिलेंडर उधार दे दिया। बैठकर चाय पीने लगीं।
बातें शहर की महंगाई से शुरू हुईं। परिवार की जिम्मेदारियों पर जा पहुँचीं। नेहा ने बताया कि अमित ऑफिस में बहुत व्यस्त रहता।
रात को थककर सो जाता। पूजा ने कहा कि घर का सारा बोझ उसी पर है। माता-पिता की देखभाल।
किराएदारों का हिसाब। दोनों को एक-दूसरे में अपना अकेलापन नजर आया। दोस्ती जल्दी गहरी हो गई।
नेहा दोपहर में नीचे चली जाती। पूजा ऊपर आ जाती। खाना साथ बनातीं।
सीरियल देखतीं। हँसतीं। अमित जब घर आता तो दोनों को साथ पाता।
पहले तो अच्छा लगता। नेहा खुश दिखती। लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि नेहा की ज्यादातर बातें अब पूजा से होती हैं।
रात को बिस्तर पर भी नेहा पूजा की बातें करती। “वह समझती है मेरी बात। तुम तो थककर सो जाते हो।
”अमित चुप रहता। मन में हल्की जलन उठती। पूजा जब आँगन में कपड़े सुखाती तो उसकी नजर चली जाती।
पतली कमर। गोल कंधे। हँसते समय आँखें मीची हो जातीं।
वह खुद को डाँटता। नेहा उसकी पत्नी है। पूजा सिर्फ पड़ोसन।
लेकिन अकेलापन दोनों तरफ से काम कर रहा था। एक शाम अमित जल्दी लौट आया। ऊपर का दरवाजा खुला था।
अंदर से हँसी आ रही थी। वह चुपचाप खड़ा रहा। नेहा बोल रही थी, “अमित अब छूते भी नहीं।
थक जाते हैं। मैं बता नहीं सकती कितना अकेला लगता है। ”पूजा की आवाज आई, “मैं समझती हूँ।
घर में रहकर भी अकेला होना सबसे भारी होता है। कभी-कभी मन करता है कोई बस सुन ले। ”अमित का दिल बैठ गया।
वह पीछे हट आया। रात को खाना खाते समय चुप रहा। नेहा ने पूछा तो उसने सिर दर्द का बहाना कर दिया।
लेकिन नींद नहीं आई। दिमाग में नेहा की बातें घूमती रहीं। पूजा की सहानुभूति।
दोनों के बीच की वो आसानी जो उससे कभी नहीं हुई थी। अगले दिन ऑफिस से लौटते समय अमित ने पूजा को आँगन में पाया। अकेली।
उसने हिम्मत करके कहा, “नेहा तुम्हारी बहुत तारीफ करती है। कहती है तुम उसे समझती हो। ”पूजा मुस्कुराई।
“नेहा अच्छी है। थोड़ी अकेली पड़ गई है इस नए शहर में। आप भी ध्यान रखना।
”बात सामान्य थी लेकिन अमित के मन में कुछ और उठ रहा था। पूजा की आँखों में एक तरह की थकान थी जो उसे अपनी लग रही थी। दोनों कुछ पल खड़े रहे।
फिर पूजा अंदर चली गई। दोस्ती और गहरी होती गई। नेहा अब रात के खाने के बाद भी नीचे चली जाती।
देर से लौटती। अमित पूछता तो कहती, “पूजा से बातें हो रही थीं। ” एक दिन नेहा ने अमित से कहा, “पूजा ने अपनी शादी के बारे में बताया।
घर वाले जोर डाल रहे हैं। लेकिन उसका मन नहीं। वह कहती है कि जिम्मेदारी इतनी है कि खुद के लिए समय ही नहीं।
”अमित सुनता रहा। मन में सवाल उठ रहे थे। क्या पूजा सच में सिर्फ दोस्त है?
या नेहा के अकेलेपन ने दोनों को एक ऐसी जगह पहुँचा दिया है जहाँ सीमाएँ धुंधली हो रही हैं? एक रविवार अमित घर पर था। नेहा नीचे पूजा के पास गई।
घंटों बाद लौटी। चेहरा थोड़ा लाल। अमित ने पूछा तो नेहा ने कहा, “पूजा से दिल की बातें हो गईं।
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया था। कहा कि तुम अकेली नहीं हो। ” अमित का गला सूख गया।
रात को जब नेहा सो गई तो वह छत पर चला गया। दिमाग में तस्वीरें बनने लगीं। नेहा और पूजा।
हाथ पकड़े। बातें करते। अगले हफ्ते कुछ ऐसा हुआ जिसने सब बदल दिया।
अमित ऑफिस से जल्दी लौटा। ऊपर का दरवाजा बंद था। नीचे से हल्की आवाजें आ रही थीं।
वह सीढ़ियों से नीचे गया। पूजा के कमरे का दरवाजा अधखुला था। अंदर नेहा और पूजा सोफे पर बैठी थीं।
नेहा का सिर पूजा के कंधे पर था। पूजा उसके बाल सहला रही थी। फिर पूजा ने नेहा का चेहरा उठाया।
दोनों की नजरें मिलीं। पूजा ने धीरे से नेहा के होठों पर होठ रख दिए। नेहा ने प्रतिरोध नहीं किया।
चुंबन गहरा होता गया। अमित वहीं खड़ा पत्थर की तरह देखता रहा। पूजा का हाथ नेहा की कमर पर था।
नेहा का हाथ पूजा की गर्दन पर। अमित चुपचाप ऊपर चला गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
गुस्सा, जलन, उत्तेजना सब एक साथ। रात को नेहा जब आई तो उसने सामान्य व्यवहार किया। लेकिन नींद नहीं आई।
सुबह पूजा से आँखें मिलाईं तो पूजा ने सामान्य मुस्कान दी। जैसे कुछ हुआ ही न हो। अमित का मन घूमने लगा।
वह पूजा को अलग नजर से देखने लगा। उसकी हँसी। उसकी थकान।
नेहा के प्रति उसका व्यवहार। एक दिन अमित अकेला घर पर था। नेहा बाजार गई थी।
पूजा ऊपर हिसाब देने आई। अमित ने दरवाजा खोला। दोनों की नजरें मिलीं।
पूजा ने कहा, “नेहा भाभी नहीं हैं? ”“बाजार गई हैं,” अमित ने जवाब दिया। आवाज में भारीपन था।
पूजा अंदर आई। हिसाब रखने लगी। अमित पास खड़ा रहा।
“तुम नेहा की बहुत मदद करती हो,” उसने कहा। पूजा ने सिर उठाया। “वह अच्छी हैं।
थोड़ी सहारे की जरूरत है। ”अमित ने धीरे से कहा, “और तुम्हें? ”पूजा की हरकतें रुक गईं।
नजरें मिलीं। हवा भारी हो गई। अमित ने कदम बढ़ाया।
पूजा पीछे नहीं हटी। अमित ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मैंने देख लिया था।
तुम दोनों को। ”पूजा का चेहरा सफेद पड़ गया। “अमित… वह… पल की बात थी।
”अमित ने उसे और करीब खींचा। “पल की बात नहीं लग रही थी। ” पूजा की साँस तेज हो गई।
अमित ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और होठों पर होठ रख दिए। पूजा ने एक पल विरोध किया फिर जवाब दिया। चुंबन में भूख थी।
अकेलापन था। अमित का हाथ उसकी कमर पर फिसल गया। पूजा के हाथ उसकी छाती पर थे।
दोनों बेडरूम की तरफ बढ़े। दरवाजा बंद किया। अमित ने पूजा की कुर्ती के बटनों को एक-एक करके खोला।
कपड़ा सरकते ही उसकी गोल और भारी स्तन बाहर आ गए। दूधिया रंग की नरम मांस जो हथेलियों में दबते ही अपना आकार बदल रहे थे। अमित ने दोनों को जोर से थाम लिया।
उँगलियों के बीच निप्पल को दबाकर मरोड़ा। पहले से खड़े लंबे निप्पल और सख्त हो गए। वह झुका और एक निप्पल को मुँह में खींच लिया।
जीभ से गोल-गोल घुमाते हुए जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्का काटा तो पूजा की कमर अपने आप उठ गई। गले से दबी हुई आवाज निकली।
दूसरी तरफ अमित का हाथ दूसरे स्तन को मसल रहा था। निप्पल को उँगलियों में लेकर खींचता। पूजा का शरीर काँप रहा था।
अमित और नीचे सरका। सलवार के नाड़े को ढीला किया। कपड़ा जाँघों तक खिसका दिया।
पैंटी पहले से गीली थी। उसने पैंटी को एक तरफ सरकाया। बीच की दरार पूरी तरह भीगी हुई चमक रही थी।
अमित ने दो मोटी उँगलियाँ वहाँ फेर दीं। गीलापन उँगलियों पर चिपक गया। फिर वह पूरा झुक गया।
मुँह लगा दिया। चौड़ी जीभ से नीचे से ऊपर तक लंबा चाटा। ऊपर की छोटी गाँठ को होंठों में लेकर जोर से चूसा।
जीभ की नोक से उसे बार-बार फटकारा। पूजा के हाथ उसके बालों में गड़ गए। जाँघें अपने आप फैल गईं।
अमित ने जीभ को अंदर तक धकेल दिया। गर्म और तंग दीवारों को चाटने लगा। बाहर निकालकर फिर क्लिटोरिस पर वापस आ जाता।
पूजा की साँसें उखड़ रही थीं। कमर बार-बार ऊपर उठ रही थी। जब पूजा का शरीर काँपने लगा तो अमित उठा।
अपनी पैंट खोली। सख्त और नसों से भरा लंड बाहर निकला। पूजा की आँखें उस पर ठहर गईं।
अमित ने उसकी दोनों जाँघें पकड़कर और चौड़ी कर दीं। मोटे सिरे को गीली दरार पर रखा। धीरे से दबाव दिया।
सिरा अंदर घुसते ही पूजा की आँखें बंद हो गईं। मुँह से लंबी कराह निकली। अमित ने और धकेला।
एक-एक इंच करके पूरा अंदर तक पहुँचा दिया। अंडकोष उसकी जाँघों से जा टकराए। दोनों की साँसें एक पल के लिए रुक गईं।
फिर अमित ने कमर हिले। पहले धीमे लंबे धक्के। हर बार पूरा निकालकर फिर जड़ तक पहुँचाता।
पूजा की भारी स्तन उसके हर धक्के के साथ उछल रहे थे। अमित ने झुककर दोनों निप्पल को फिर मुँह में ले लिया। चूसते हुए गति तेज कर दी।
बिस्तर की चरमराहट तेज हो गई। पूजा के नाखून उसकी पीठ पर लकीरें बना रहे थे। अंदर की दीवारें लंड को जकड़ रही थीं।
पानी की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। अमित ने उसकी टाँगें अपने कंधों पर चढ़ा दीं। और गहराई तक पहुँचने लगा।
पूजा का शरीर अकड़ गया। जोर से काँपते हुए वह चरम पर पहुँची। अंदर की मांसपेशियाँ लंड को बार-बार जकड़ रही थीं।
अमित ने भी रुकना बंद किया। अंतिम तेज धक्कों के साथ गर्म पानी की धार उसके अंदर छोड़ दी। दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे से चिपके रहे।
साँसें अभी भी हाँफ रही थीं। दोनों पसीने से तर लेटे रहे। पूजा ने धीरे से कहा, “यह और उलझा देगा सब।
”अमित चुप रहा। मन में नेहा का चेहरा घूम रहा था। नेहा लौटी तो दोनों सामान्य बनने की कोशिश करते।
लेकिन हवा बदल चुकी थी। नेहा को लगने लगा कि पूजा अब थोड़ी दूर है। अमित भी।
एक दिन नेहा ने पूजा से पूछा, “तुम मुझसे कुछ छुपा रही हो? ”पूजा नजरें चुरा गईं। “नहीं।
”लेकिन नेहा का शक बढ़ गया। रात को उसने अमित से कहा, “पूजा के व्यवहार में बदलाव है। तुम्हें कुछ पता है?
”अमित ने इनकार किया। लेकिन नींद में करवटें बदलता रहा। कुछ दिनों बाद फिर मौका मिला।
नेहा अपने मायके जा रही थी दो दिन के लिए। अमित और पूजा घर में अकेले रह गए। रात को पूजा ऊपर आई।
दोनों देर तक बातें करते रहे। अकेलापन फिर हावी हो गया। अमित ने पूजा को सोफे पर खींचा।
कुर्ती उतारी। चूचियाँ चूसीं। निप्पल काटे।
सलवार हटाई। जीभ से पूरी तरह गीला किया। फिर लंड अंदर डाला।
इस बार और जोर से। पूजा की टाँगें उसकी कमर पर लिपट गईं। अमित ने उसकी गांड के गाल फैलाकर उँगली अंदर डाली।
पूजा की कराहें घर में गूंजने लगीं। दोनों कई बार चरम पर पहुँचे। सुबह होते-होते थककर सो गए।
नेहा लौटी तो घर में अजीब तनाव था। पूजा कम आने लगी। अमित ज्यादा चुप।
एक दिन नेहा ने दोनों को आँगन में बात करते देखा। नजरें मिलीं तो पूजा ने मुँह फेर लिया। नेहा का दिल बैठ गया।
रात को उसने अमित से सीधा पूछ लिया। “तुम्हारे और पूजा के बीच कुछ है? ”अमित कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला, “एक गलती हो गई। ”नेहा की आँखों से आँसू बह निकले। “मैं उससे दिल की बातें करती थी।
वह मेरी सहेली थी। तुमने…”अमित ने माफी माँगी। लेकिन बात बिगड़ चुकी थी।
नेहा ने पूजा से भी पूछा। पूजा रो पड़ी। “मैं अकेली थी।
नेहा तुम भी। अमित भी। सब उलझ गया।
”तीनों के बीच अब खामोशी छा गई। नेहा ऊपर रहती। पूजा नीचे।
अमित ऑफिस और घर के बीच। कभी-कभी नजरें मिल जातीं तो जल्दी हट जातीं। लेकिन शरीर की यादें बाकी थीं।
अमित रात को नेहा के पास लेटता तो पूजा का चेहरा याद आ जाता। नेहा पूजा से बात करने की सोचती तो रुक जाती। पूजा अकेली बैठकर दोनों को याद करती।
एक शाम बिजली चली गई। तीनों आँगन में इकट्ठा हो गए। मोमबत्ती की रोशनी में चेहरे धुँधले लग रहे थे।
नेहा ने अचानक कहा, “हम तीनों ने जो किया वह छुपा नहीं सकते। लेकिन आगे क्या? ”पूजा ने सिर झुकाया।
अमित ने जवाब दिया, “मैं गलती मानता हूँ। लेकिन जो हुआ उसमें अकेलापन सबका था। ”बातें लंबी चलीं।
गुस्सा, माफी, समझ। कोई साफ समाधान नहीं निकला। लेकिन एक सहमति बनी कि अब सीमाएँ फिर से खींची जाएँगी।
पूजा कम आएगी। नेहा और अमित अपनी शादी सँभालने की कोशिश करेंगे। कुछ हफ्ते बीत गए।
तनाव कम हुआ। लेकिन यादें बाकी रहीं। अमित कभी-कभी पूजा की हँसी सुनता तो रुक जाता।
नेहा नीचे जाते समय दिल की धड़कन सुनती। पूजा ऊपर का दरवाजा देखती तो पुरानी दोस्ती याद आ जाती। किराए के उस मकान ने तीनों को एक ऐसी जगह पहुँचा दिया था जहाँ दोस्ती, शादी और आकर्षण सब मिलकर एक नया रूप ले चुके थे।
रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे। कुछ टूटे। कुछ बदले।
कुछ यादों में दब गए। शहर की भागदौड़ में तीनों अपनी-अपनी जगह पर वापस लौटने की कोशिश करते रहे। लेकिन ऊपरी मंजिल और निचली मंजिल के बीच की वो सीढ़ियाँ अब सिर्फ सीढ़ियाँ नहीं रहीं।
वे एक ऐसी कहानी बन गईं जो तीनों के अंदर चुपचाप चलती रही। अकेलापन, गलती, माफी और वो रातें जब सीमाएँ धुंधली पड़ गई थीं। मकान पुराना था।
दीवारें वही थीं। लेकिन रिश्तों के मायने हमेशा के लिए बदल चुके थे। अमित ऑफिस जाता।
नेहा घर सँभालती। पूजा किराए का हिसाब रखती। बाहर से सब सामान्य दिखता।
अंदर तीनों जानते थे कि कुछ चीजें वापस नहीं आतीं। और कुछ चाहतें जिंदगी भर साथ रह जाती हैं। चाहे उन्हें कितना भी दबा लिया जाए।