ट्रेन की खिड़की से बाहर का दृश्य तेजी से पीछे छूट रहा था। मेघा ने अपनी किताब बंद की और सिर उठाया। सामने वाली सीट पर बैठा युवक उसे देख रहा था।
तीस के करीब उम्र, साफ कपड़े, आँखों में हल्की थकान और मुस्कान। “किताब अच्छी है? ” उसने पूछा।
मेघा थोड़ी सकपकाई। “हाँ… ठीक है। ”“मैं कबीर।
दिल्ली जा रहा हूँ। ”“मेघा। मैं भी।
”बातचीत यहीं रुक जाती, लेकिन ट्रेन में अचानक बिजली चली गई। डिब्बा अंधेरे में डूब गया। कबीर की आवाज करीब से सुनाई दी।
“डर तो नहीं लग रहा? ”मेघा ने हँसी में जवाब दिया। “नहीं।
” लेकिन दिल जोर से धड़क रहा था। अंधेरे में कबीर का इत्र महसूस हो रहा था। जब रोशनी आई तो दोनों की नजरें फिर मिलीं।
इस बार थोड़ी देर ज्यादा टिकीं। दिल्ली स्टेशन पर उतरते समय कबीर ने कहा, “अगर कभी चाय पीनी हो तो बताइएगा। ” मेघा ने मुस्कुराकर फोन नंबर ले लिया।
सोचा था कभी फोन नहीं करेगी। लेकिन शाम को खुद उसके नंबर पर मैसेज कर बैठी। अगले दिन दोनों एक छोटी सी कैफे में मिले।
बातें काम की हुईं, परिवार की हुईं। कबीर अविवाहित था, मेघा शादीशुदा। पति विदेश में नौकरी करता था।
साल में एक बार आता था। अकेली जिंदगी की बातें करते-करते समय निकल गया। तीसरी मुलाकात में कबीर ने मेघा का हाथ पकड़ लिया।
“आपको देखकर अजीब सा लगता है। ” मेघा ने हाथ नहीं छुड़ाया। कैफे से निकलकर दोनों पार्क की तरफ चले।
शाम का अंधेरा घिर रहा था। पेड़ों के नीचे कबीर ने मेघा को अपनी तरफ खींचा और होठों पर होठ रख दिए। मेघा की साँस रुक गई।
चुंबन गहरा होता गया। कबीर का हाथ उसकी कमर पर था, फिर धीरे-धीरे ऊपर सरक रहा था। मेघा ने धक्का दिया।
“नहीं… ऐसा नहीं होना चाहिए। ”कबीर रुका। “मैं मजबूर नहीं कर रहा।
लेकिन आप भी चाहती हैं। मैं देख सकता हूँ। ”मेघा चुप रही।
शरीर में गर्मी फैल रही थी। घर लौटकर उसने आईने में खुद को देखा। गाल लाल थे।
रात भर नींद नहीं आई। कबीर का चुंबन बार-बार याद आता रहा। अगली मुलाकात मेघा के घर पर हुई।
पति विदेश में था। बेटा हॉस्टल में। घर खाली था।
कबीर आया तो मेघा ने दरवाजा खोलते ही कहा, “सिर्फ बात करने के लिए बुलाया है। ”कबीर मुस्कुराया। “जैसा आप कहें।
”लिविंग रूम में बैठे-बैठे बातें होने लगीं। धीरे-धीरे कबीर पास खिसक आया। मेघा की साड़ी के पल्लू को हल्के से छुआ।
“आप बहुत खूबसूरत लगती हैं। ” मेघा का दिल तेज धड़कने लगा। कबीर ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और फिर से चूम लिया।
इस बार मेघा ने विरोध नहीं किया। चुंबन लंबा चला। कबीर की जीभ उसके मुँह में घुस गई।
मेघा के हाथ खुद उसके बालों में उलझ गए। कबीर का हाथ ब्लाउज के हुक पर पहुँचा। एक-एक करके खोले।
मेघा की चूचियाँ बाहर आ गईं। कबीर ने दोनों को हाथों में लिया और धीरे से दबाने लगा। निप्पल सख्त हो चुके थे।
उसने झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया और चूसने लगा। मेघा की कराह निकल गई। “कबीर… रुको…” लेकिन शरीर आगे की ओर झुक रहा था।
कबीर ने दूसरी चूची भी चूसी। दाँतों से हल्का काटा। मेघा की कमर ऐंठ गई।
कबीर ने मेघा को सोफे पर लिटा दिया। साड़ी ऊपर की। पैंटी के ऊपर से उसकी चूत को सहलाने लगा।
पैंटी गीली हो चुकी थी। उसने पैंटी खींचकर उतार दी। दो उँगलियाँ चूत के अंदर डाल दीं।
मेघा की टाँगें काँपने लगीं। “आह… धीरे…” कबीर ने उँगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। साथ में अंगूठे से ऊपर की गाँठ को रगड़ रहा था।
मेघा का शरीर उठने-गिरने लगा। जल्दी ही वह काँपते हुए चरम पर पहुँच गई। पानी कबीर की उँगलियों पर लग गया।
कबीर ने अपना लंड निकाला। मोटा और सख्त। मेघा ने आँखें बंद कर लीं।
कबीर ने उसके ऊपर चढ़ाई की और लंड का सिरा चूत पर रखा। धीरे-धीरे धकेला। मेघा की आँखें खुल गईं।
“बहुत… बड़ा…” कबीर ने पूरा अंदर कर दिया। दोनों कुछ पल रुके। फिर कबीर ने धक्के लगाने शुरू किए।
धीरे-धीरे तेज होते गए। हर धक्के के साथ मेघा की चूचियाँ हिल रही थीं। कबीर ने उन्हें मुँह में ले रखा था।
मेघा के नाखून उसकी पीठ पर चिपक गए। “जोर से… और जोर से करो…”कबीर ने मेघा की टाँगें अपने कंधों पर रख दीं। लंड और गहराई तक जा रहा था।
चूत की दीवारें उसे जकड़ रही थीं। मेघा दूसरी बार चरम पर पहुँची। कबीर ने भी रोकना बंद किया और उसके अंदर ही सब छोड़ दिया।
दोनों पसीने से भीगे लेटे रहे। मेघा की आँखों में आँसू थे। “ये गलत है,” उसने फुसफुसाया।
कबीर ने उसके बाल सहलाए। “लेकिन अच्छा लग रहा है न? ”मेघा ने जवाब नहीं दिया।
शरीर अभी भी काँप रहा था। उसके बाद मुलाकातें छिप-छिप कर होने लगीं। कभी मेघा के घर, कभी कबीर के फ्लैट में।
हर बार आकर्षण और गहरा होता गया। एक दिन कबीर ने मेघा को घोड़ी बनाकर पीछे से लिया। एक दिन मेघा खुद ऊपर बैठकर हिप्स हिलाने लगी।
चूचियाँ कबीर के मुँह में रहतीं। वह काट-काट कर चूसता। मेघा की कराहें दबी होतीं।
एक शाम कबीर ने मेघा की गांड को सहलाते हुए कहा, “यहाँ भी लेना चाहता हूँ। ”मेघा पहले हिचकिचाई। फिर तैयार हो गई।
कबीर ने तेल लगाया। पहले उँगली डाली, फिर धीरे-धीरे लंड। दर्द के साथ मजा भी आया।
मेघा की आवाजें बदल गईं। कबीर पूरे जोर से धक्के लगा रहा था। गांड तंग थी।
अंत में दोनों एक साथ काँप उठे। लेकिन खामोशी और डर भी साथ चल रहे थे। मेघा का पति जल्द आने वाला था।
कबीर कहता, “मुझसे शादी कर लो। ” मेघा सिर हिलाती। “मेरा बेटा है… मेरी जिंदगी है।
”एक दिन पति अचानक जल्दी लौट आया। मेघा और कबीर घर में थे। कपड़े ठीक करने की भी देर न हुई।
पति ने सब देख लिया। वह चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “तुम दोनों बाहर निकलो।
बात करते हैं। ”कबीर चला गया। मेघा रोती रही।
पति ने सिर्फ इतना कहा, “अब तुम तय करो कि क्या चाहिए। ”रात भर मेघा जागती रही। शरीर में कबीर का स्पर्श अभी भी जीवित था।
चूत और गांड दोनों में उसकी याद थी। मन में पति का चेहरा और बेटे का भविष्य घूम रहा था। अगले दिन कबीर ने फोन किया।
“मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। ”मेघा ने रोते हुए कहा, “सब बर्बाद हो जाएगा। ”फिर भी तीन दिन बाद दोनों फिर मिले।
कबीर के फ्लैट में। दरवाजा बंद होते ही कबीर ने मेघा को दीवार से सटा दिया। होठों पर जोरदार चुंबन किया।
जीभ गहराई तक घुसा दी। मेघा रोते-रोते भी उसके शरीर से चिपक गई। मन में पति और बेटा घूम रहे थे, लेकिन शरीर पहले ही हार चुका था।
कबीर ने उसके कपड़े जल्दी-जल्दी उतारे। ब्लाउज के हुक खोले और चूचियों को मुट्ठी में भरकर मसलने लगा। निप्पल को उँगलियों के बीच दबाया और मोड़ा।
मेघा कराह उठी। कबीर ने झुककर दोनों चूचियों को बारी-बारी मुँह में लिया। जोर से चूसा, दाँतों से काटा, जीभ से गोल-गोल घुमाया।
मेघा की चूचियाँ लाल हो गईं। “आह… काटो… और जोर से…”कबीर ने मेघा को पलटा और दीवार से लगाकर खड़ा कर दिया। साड़ी और पैंटी एक झटके में नीचे खींच दी।
उसकी चूत पहले से भीगी हुई थी। कबीर ने दो मोटी उँगलियाँ अंदर डाल दीं और तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। पानी की आवाज आने लगी।
मेघा की टाँगें काँप रही थीं। तभी कबीर ने अपना लंड निकाला। मेघा की नजर उसके लंड पर पड़ी।
मन में अचानक पति का लंड याद आ गया। पति का लंड पतला और छोटा था। कबीर का लंड उससे काफी मोटा और लंबा था।
नसें फूली हुई थीं, सिरा चमक रहा था। मेघा का दिल पति और बेटे के लिए तड़प रहा था, लेकिन आँखें उस मोटे लंड पर टिकी थीं। शरीर खुद आगे बढ़ गया।
“इतना मोटा… पति से कितना बड़ा है…” उसने अनजाने में फुसफुसा दिया। कबीर मुस्कुराया। उसने लंड का मोटा सिरा मेघा की चूत पर रखा और एक झटके में आधा अंदर धकेल दिया।
मेघा चीख पड़ी। “आह… इतना मोटा… पूरा अंदर जा रहा है…” पति का लंड कभी इतनी गहराई तक नहीं पहुँचा था। कबीर ने बिना रुके पूरा लंड चूत में धँस दिया।
अंडकोष टकरा गए। फिर उसने पागलों की तरह धक्के लगाने शुरू कर दिए। दीवार से मेघा की पीठ रगड़ खा रही थी।
हर धक्के के साथ मोटा लंड चूत की दीवारों को फैला रहा था। मेघा की आँखों में आँसू थे—मन पति को पुकार रहा था, लेकिन चूत कबीर के मोटे लंड को निगल रही थी। “और जोर से चोदो… पति का तो इतना मोटा था ही नहीं…”कबीर ने उसकी एक टाँग अपनी कमर पर चढ़ा ली।
लंड और गहराई तक जा रहा था। मेघा की चूचियाँ उसके हाथों में मसली जा रही थीं। निप्पल को मोड़-मोड़ कर दबा रहा था।
मेघा का शरीर काँप रहा था। मन में बेटे का चेहरा आ रहा था, लेकिन चूत में भरा मोटा लंड उसे बार-बार चरम की तरफ धकेल रहा था। वह जोर से काँपते हुए झड़ गई।
पानी कबीर के लंड पर बहने लगा। कबीर ने लंड निकाला। मेघा की चूत खुली और लाल हो चुकी थी।
उसने मेघा को घुटनों के बल कर दिया। गांड के दोनों गालों को फैलाया। गुलाबी छेद दिख रहा था।
कबीर ने थूक लगाया और लंड का मोटा सिरा गांड पर रखा। “अब गांड में ले। ” मेघा ने सिर हिलाया।
मन विरोध कर रहा था, लेकिन शरीर ने गांड पीछे कर दी। कबीर ने दबाव डाला। मोटा सिरा अंदर घुस गया।
मेघा की चीख निकल गई। “आह… बहुत मोटा… पति का तो कभी गांड में गया ही नहीं… दर्द हो रहा है लेकिन मत निकाल…”कबीर ने धीरे-धीरे पूरा लंड गांड में धकेल दिया। मेघा के आँसू फर्श पर टपक रहे थे।
मन पति और बेटे को याद कर रहा था, लेकिन गांड में भरा मोटा लंड उसे पागल कर रहा था। कबीर ने जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ गांड की चमड़ी लहराने लगी।
लंड पूरी तरह अंदर-बाहर हो रहा था। मेघा की चूचियाँ नीचे लटककर हिल रही थीं। कबीर ने एक हाथ से उसकी चूत में उँगलियाँ डाल दीं।
“बोल… किसका लंड ज्यादा मोटा है? ” मेघा रोते-रोते बोली, “तुम्हारा… पति से बहुत मोटा और बड़ा… इसीलिए रुक नहीं पा रही…”कबीर की गति और तेज हो गई। गांड का छेद लंड के इर्द-गिर्द सफेद होने लगा।
मेघा तीसरी बार चरम पर पहुँची। उसका शरीर अकड़ गया। कबीर ने भी गांड की गहराई में ही सब छोड़ दिया।
इतना कि गर्म पानी बाहर निकलकर मेघा की जाँघों पर बहने लगा। दोनों थककर फर्श पर गिर गए। मेघा रो रही थी।
मन में पति और बेटा थे, लेकिन शरीर अभी भी कबीर के मोटे लंड की गर्मी महसूस कर रहा था। चूत और गांड दोनों सूज गए थे। पति का पतला लंड याद आकर और भी बेचैन कर रहा था।
परिणाम आने शुरू हो गए। पति ने दूरी बना ली। बेटा कुछ पूछने लगा।
समाज की आँखें महसूस होने लगीं। मेघा हर रात रोती, लेकिन शरीर कबीर के मोटे लंड को पुकारता। रात में अकेली लेटी रहती तो पति का चेहरा याद आता, बेटे की हँसी याद आती, लेकिन चूत में कबीर का मोटा लंड घूमता रहता।
शरीर उसी मोटे और बड़े लंड की भूख में तड़पता। एक रात मेघा ने कबीर से कहा, “आखिरी बार…”उस रात दोनों ने कोई सीमा नहीं रखी। कबीर के फ्लैट में पहुँचते ही मेघा ने खुद उसके पैंट के बटन खोले।
लंड निकाला और दोनों हाथों से पकड़ लिया। “इतना मोटा… पति का तो आधा भी नहीं था…” उसने लंड को मुँह में लिया। गले तक समेटने की कोशिश की।
लार टपकाते हुए चूसने लगी। कबीर उसके बाल पकड़कर धक्के लगा रहा था। फिर उसने मेघा को बिस्तर पर लिटाया।
पहले चूत में मोटा लंड पूरा अंदर तक डाला। जोर-जोर से धक्के लगाए। मेघा की टाँगें उसके कंधों पर थीं।
“पति का लंड कभी इतनी गहराई तक नहीं गया… तुम्हारा इतना बड़ा है कि पेट तक महसूस हो रहा है…”फिर कबीर ने उसे पलट दिया। गांड के छेद पर थूक लगाया और मोटा लंड एक झटके में अंदर धकेल दिया। मेघा चीख पड़ी।
“आह… गांड फट रही है… लेकिन मत रुक… पति का तो इतना मोटा था ही नहीं… इसी मोटे लंड ने मुझे बर्बाद कर दिया…” कबीर पूरे जोर से गांड चोद रहा था। एक हाथ से चूत में उँगलियाँ डाले हुए था, दूसरे से चूचियाँ निचोड़ रहा था। मेघा पागलों की तरह कराह रही थी।
मन में पति और बेटा रो रहे थे, लेकिन शरीर कबीर के मोटे लंड पर झूल रहा था। वह बार-बार चरम पर पहुँचती रही। जब कबीर आखिरी बार गांड की गहराई में छोड़ रहा था तो मेघा ने उसे कसकर पकड़ लिया।
“मत छोड़ना मुझे…” लेकिन आवाज में खुद का भी यकीन नहीं था। आँसू बह रहे थे। दिल पति और बेटे के साथ था, लेकिन चूत और गांड दोनों कबीर के मोटे और बड़े लंड की गुलाम हो चुके थे।
सुबह मेघा घर लौटी। आईने में देखा। शरीर पर निशान थे।
चूत और गांड दोनों अभी भी कबीर के मोटे लंड का आकार याद कर रहे थे। आँखों में थकान और भूख दोनों। खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर की दुनिया देखती रही।
अचानक शुरू हुई मुलाकात ने जो आग जलाई थी, वह अब आसानी से बुझने वाली नहीं थी। कठिन फैसले बाकी थे। नतीजे भी।
लेकिन उस पल मेघा सिर्फ इतना जानती थी कि कबीर के मोटे लंड के बिना उसका शरीर अब अधूरा लगता है। दिल पति और बेटे को चाहता था, लेकिन शरीर उसी बड़े और मोटे लंड की भूख में जल रहा था। दो सहमति रखने वाले लोगों की ये खामोश चाहत अब खुले रूप में उनके सामने खड़ी थी।
आगे क्या होगा—ये फैसला अभी बाकी था।